एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | फरवरी 2026
इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन साहस की पहचान भी कराता है
कहते हैं इतिहास अपने को दोहराता है, मगर वह यह भी तय करता है कि कठिन समय में कौन नेतृत्व करता है और कौन पीछे हटता है। 2004 का एक वीडियो इन दिनों फिर चर्चा में है, जो भारतीय संसद के भीतर सत्ता, विपक्ष और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की एक अहम तस्वीर पेश करता है। यह वीडियो राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान का है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सदन में बोलने के लिए खड़े हुए थे।
प्रधानमंत्री के बेहद क़रीब आकर किया गया हंगामा
वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि उस समय विपक्ष में बैठी Bharatiya Janata Party के करीब 11 सांसद प्रधानमंत्री के आसन के बिल्कुल नज़दीक आकर ज़ोरदार हंगामा करते हैं। कुछ सांसद नारेबाज़ी करते हुए काग़ज़ फाड़कर प्रधानमंत्री की ओर फेंकते नज़र आते हैं। माहौल अत्यंत तनावपूर्ण था और सदन की गरिमा को ठेस पहुंचती दिख रही थी।
न डर, न पलायन—डटे रहे मनमोहन सिंह
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान, जो लगभग एक मिनट सैंतीस सेकंड तक चला, मनमोहन सिंह न तो विचलित हुए, न ही अपनी जगह छोड़ी। न उन्होंने सदन से बाहर जाने का विकल्प चुना और न ही हंगामे के आगे झुके। वे अपनी बात रखने के लिए खड़े रहे और संसदीय प्रक्रिया के तहत अपनी भूमिका निभाते रहे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह दृश्य सिर्फ़ एक संसदीय टकराव नहीं, बल्कि नेतृत्व की मानसिक दृढ़ता का उदाहरण था।
आज के संदर्भ में क्यों अहम है यह वीडियो
यह वीडियो ऐसे समय में सामने आया है, जब संसद में बार-बार कार्यवाही बाधित होने, माइक बंद होने और बहस से बचने जैसे आरोप लगते रहे हैं। जानकारों का कहना है कि 2004 की यह घटना आज के सत्तापक्ष और विपक्ष—दोनों के लिए आत्ममंथन का अवसर है। सवाल उठता है कि क्या आज का राजनीतिक नेतृत्व भी उसी तरह दबाव और विरोध के बीच सदन का सामना करने को तैयार है?
राजनीतिक विरासत और संसदीय मर्यादा
राजनीतिक टिप्पणीकारों के अनुसार, इस वीडियो में सिर्फ़ तत्कालीन प्रधानमंत्री का आचरण ही नहीं, बल्कि उस दौर के विपक्ष की संसदीय शैली भी दर्ज है। यह याद दिलाता है कि संसद में हंगामे और विरोध का इतिहास पुराना है, लेकिन नेतृत्व का मूल्यांकन इस बात से होता है कि वह ऐसे क्षणों में कैसे खड़ा रहता है।
लोकतंत्र के लिए सबक
2004 का यह दृश्य आज भी लोकतंत्र के विद्यार्थियों और जनप्रतिनिधियों के लिए एक सबक की तरह देखा जा रहा है—कि सत्ता और विपक्ष, दोनों की असली परीक्षा संसद के भीतर होती है। इतिहास यह दर्ज करता है कि कौन शोर के बीच भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभाता है और कौन हालात से बचने का रास्ता चुनता है।
यह वीडियो केवल अतीत की एक झलक नहीं, बल्कि आज की राजनीति के लिए एक आईना बनकर सामने आया है—जहां साहस, संयम और संसदीय मर्यादा की कसौटी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।




