एबीसी नेशनल न्यूज | 5 फरवरी 2026
नई दिल्ली। जिस सदन को देश की सबसे गरिमामयी संस्था कहा जाता है, उसी लोकसभा में अगर गालियां गूँजें, इतिहास के नेताओं को अपमानित किया जाए और सत्ता पक्ष ठहाके लगाए—तो “गालियों का तांडव” कहना अतिशयोक्ति नहीं, सच्चाई है। यही वजह है कि आज संसद के अंदर हुई घटना ने एक बार फिर देश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या संविधान और मर्यादा सबके लिए समान हैं, या कुछ के लिए नियम बदल जाते हैं। इस दौरान माइक एक बार भी बंद नहीं हुआ अगर राहुल गांधी, अखिलेश यादव या विपक्ष का कोई भी नेता कुछ बोलता है तो एक सेकंड में माइक बंद किया जाता है।
सामने आए वीडियो में बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे लोकसभा के अंदर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, शहीद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के लिए अभद्र, अशोभनीय और आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं। हाथों में कथित किताबें लहराई जाती हैं, शब्दों की मर्यादा तोड़ी जाती है—और यह सब कैमरों के सामने, पूरे देश के सामने होता है।
कांग्रेस नेत्री रागिनी नायक ने इस पूरे घटनाक्रम को “संसद की गरिमा की सार्वजनिक हत्या” बताते हुए कहा कि यह किसी एक सांसद की ज़ुबान फिसलने का मामला नहीं है। नायक के अनुसार, करीब दो मिनट चौंतीस सेकंड के इस वीडियो में जो भाषा इस्तेमाल की गई, वह योजनाबद्ध और निर्भीक है—क्योंकि बोलने वाले को पता था कि उसे रोका नहीं जाएगा। उनके शब्दों में, “जब अभद्र भाषा पर सत्ता पक्ष हँसता है, तो साफ हो जाता है कि यह व्यक्तिगत बयान नहीं, बल्कि सत्ता की मौन सहमति है।”
सबसे गंभीर सवाल संसद की भूमिका पर खड़ा होता है। रागिनी नायक का आरोप है कि अध्यक्ष की ओर से रोकने का सिर्फ औपचारिक प्रयास दिखा, लेकिन सख्त हस्तक्षेप कहीं नजर नहीं आया। उल्टा, संसद टीवी पर बार-बार वही वीडियो और ऑडियो चलता रहा, मानो अपमान को ही प्रसारित करना ज़रूरी समझा गया हो। ट्रेज़री बेंच पर बैठे सांसदों की हँसी ने इस दृश्य को और ज़्यादा पीड़ादायक बना दिया—क्योंकि वह हँसी सिर्फ मज़ाक नहीं, सत्ता का संदेश थी।
कांग्रेस ने इस पूरे मामले में दोहरे मापदंडों पर सीधा सवाल उठाया है। कहा गया है कि जब विपक्ष के नेता राहुल गांधी संसद में बोलते हैं, तो माइक बंद कर दिया जाता है, शब्द कार्यवाही से हटा दिए जाते हैं और अनुशासन की दुहाई दी जाती है। लेकिन जब सत्ता पक्ष का सांसद गालियां दे, इतिहास के नेताओं को अपमानित करे और सदन की मर्यादा तोड़े—तो सब कुछ चलता है? क्या लोकतंत्र की मर्यादा सिर्फ विपक्ष के लिए है?
रागिनी नायक ने साफ कहा, “यह भाषा का नहीं, सत्ता के चरित्र का सवाल है। जब गालियों पर सत्ता मुस्कुराए और कुर्सी पर बैठा व्यक्ति मौन रहे, तो वह लोकतंत्र नहीं, बहुमत का अहंकार बन जाता है।”
अब पूरे देश की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर टिकी हैं। विपक्ष का सवाल सीधा और भावनात्मक है— क्या इस पर जवाब मिलेगा? क्या कोई कार्रवाई होगी? या फिर इतिहास में यह दिन भी दर्ज हो जाएगा, जब संसद में गालियां बोली गईं और लोकतंत्र चुपचाप सुनता रहा? क्योंकि आज सवाल सिर्फ नेहरू, इंदिरा या सोनिया का नहीं है— सवाल संसद का है, संविधान का है और उस भरोसे का है, जो देश ने लोकतंत्र पर किया है।




