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WATCH VIDEO — 18% टैरिफ की बेड़ियां बनाम 0% का खुला मैदान, बर्बाद हो जाएगा भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर: राहुल गांधी

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एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 13 फरवरी 2026

‘अनफेयर रेस’ का आरोप: वैश्विक बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धा पर बड़ा सवाल

लोकसभा में नेता विपक्ष Rahul Gandhi ने भारतीय टेक्सटाइल उद्योग को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि मौजूदा व्यापारिक परिस्थितियों में भारत एक “अनफेयर रेस” में धकेला जा रहा है। उनका कहना है कि जब दुनिया के बड़े बाजारों—विशेष रूप से अमेरिका और यूरोपीय संघ—में आयात शुल्क की संरचना असमान है, तब भारत 18% तक के टैरिफ के बोझ के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है, जबकि बांग्लादेश जैसे देशों को 0% टैरिफ की सुविधा मिल रही है। राहुल गांधी ने इसे नीति-निर्माण की गंभीर चूक बताया और चेतावनी दी कि यदि स्थिति नहीं बदली तो भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर की वैश्विक हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है। उनके बयान ने राजनीतिक हलकों के साथ-साथ उद्योग जगत में भी चर्चा तेज कर दी है।

टैरिफ का अंतर: बांग्लादेश को विशेष रियायत, भारत पर सामान्य शुल्क

रेडीमेड गारमेंट और टेक्सटाइल निर्यात के मामले में बांग्लादेश को यूरोपीय संघ के ‘Everything But Arms (EBA)’ कार्यक्रम के तहत ड्यूटी-फ्री और कोटा-फ्री प्रवेश प्राप्त है। इस व्यवस्था के कारण वहां से निर्यात होने वाले अधिकांश उत्पादों पर 0% टैरिफ लागू होता है, जिससे उसकी कीमत प्रतिस्पर्धात्मक रूप से कम रहती है। इसके विपरीत भारत को सामान्यीकृत टैरिफ दरों का सामना करना पड़ता है। यूरोपीय बाजार में कई श्रेणियों पर 9% से 12% तक शुल्क लगता है, जबकि अमेरिका में तैयार परिधानों पर औसत आयात शुल्क 16% से 18% तक हो सकता है। यह अंतर भारतीय निर्यातकों की लागत और मुनाफे को सीधे प्रभावित करता है। हालांकि भारत के पास व्यापक उत्पादन श्रृंखला, कपास उत्पादन में अग्रणी स्थिति और विशाल घरेलू बाजार जैसी मजबूत संरचनात्मक विशेषताएं हैं, फिर भी टैरिफ असमानता वैश्विक प्रतिस्पर्धा को चुनौतीपूर्ण बना देती है।

‘सरेंडर’ की राजनीति: राहुल का आरोप और सरकार की सफाई

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर यह आरोप भी लगाया कि अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की शर्तों के सामने “सरेंडर” किया गया, जिससे भारतीय उद्योग के हित प्रभावित हो सकते हैं। उनका तर्क है कि यदि भारत को समान व्यापारिक अवसर नहीं मिलते, तो लाखों श्रमिकों की आजीविका पर असर पड़ेगा। दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि भारत अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए सक्रिय रूप से द्विपक्षीय और बहुपक्षीय वार्ताओं में भाग ले रहा है। सरकार ने ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) का हवाला देते हुए दावा किया है कि इनसे निर्यात को बढ़ावा मिला है। साथ ही, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना और PM MITRA मेगा टेक्सटाइल पार्क परियोजनाओं को उद्योग को आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया है।

ताकत बनाम चुनौतियां: भारतीय टेक्सटाइल उद्योग की जमीनी हकीकत

भारत का टेक्सटाइल और परिधान क्षेत्र देश के सबसे बड़े रोजगार प्रदाताओं में से एक है और करोड़ों लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार देता है। स्पिनिंग से लेकर गारमेंट निर्माण तक पूरी वैल्यू चेन देश के भीतर मौजूद है, जो इसे कई प्रतिस्पर्धी देशों से अलग पहचान देती है। इसके बावजूद उद्योग उच्च लॉजिस्टिक लागत, ऊर्जा दरों, अनुपालन व्यय और वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों को विकसित बाजारों में ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिलने से प्रतिस्पर्धा और तीखी हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत को समान व्यापारिक शर्तें नहीं मिलतीं, तो उसे लागत घटाने, तकनीकी उन्नयन और गुणवत्ता सुधार पर अतिरिक्त जोर देना होगा।

क्या भारत सचमुच रेस में पीछे है? संतुलित दृष्टिकोण जरूरी

अर्थशास्त्रियों के अनुसार केवल टैरिफ दरें ही प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति का निर्धारण नहीं करतीं। उत्पादन दक्षता, श्रम उत्पादकता, सप्लाई चेन की मजबूती, ब्रांड वैल्यू और तकनीकी नवाचार भी उतने ही अहम कारक हैं। भारत के पास कच्चे माल की उपलब्धता और बड़े घरेलू बाजार का लाभ है, जबकि बांग्लादेश मुख्यतः रेडीमेड गारमेंट निर्यात पर केंद्रित है। इसलिए यह कहना कि भारत पूरी तरह पिछड़ गया है, एकतरफा आकलन होगा। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि यदि प्रमुख निर्यात बाजारों में समान अवसर नहीं मिले, तो भारतीय निर्यातकों को अतिरिक्त दबाव झेलना पड़ सकता है।

सियासत से आगे की बहस: रोजगार और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

राहुल गांधी का बयान राजनीतिक संदर्भ में आया है, लेकिन मुद्दा केवल सियासत तक सीमित नहीं है। टेक्सटाइल क्षेत्र ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार का बड़ा स्रोत है और देश के निर्यात राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान देता है। ऐसे में टैरिफ असमानता और व्यापार समझौतों पर उठे सवाल व्यापक आर्थिक प्रभाव रखते हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत वैश्विक व्यापारिक परिदृश्य में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए कौन-से कदम उठाता है, क्योंकि इस क्षेत्र की मजबूती सीधे तौर पर देश की आर्थिक स्थिरता और रोजगार सुरक्षा से जुड़ी हुई है।

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