भारत के चुनावी तंत्र पर एक बार फिर सवाल उठ खड़े हुए हैं। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग मतदान से कुछ दिन पहले तक वोटर लिस्ट में बदलाव करता रहता है और इतनी देर तक जारी किए गए संशोधनों की जानकारी न तो डिजिटल रूप में समय पर उपलब्ध कराई जाती है और न ही किसी केंद्रीकृत माध्यम से यह बताया जाता है कि किन मतदाताओं को जोड़ा गया और किनके नाम हटा दिए गए। इन आरोपों के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता नदारद है और यह जिम्मेदारी मतदाता या राजनीतिक दलों के कंधों पर डाल दी जाती है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में खोजबीन करके पता लगाते रहें कि आखिर वोट का अधिकार किसके हाथ में बचा है और किसका गायब कर दिया गया है।
विपक्ष का कहना है कि जब चुनाव आयोग भारत जैसे विशाल लोकतंत्र का संरक्षक है, तो फिर उसकी जवाबदेही सबसे अधिक होनी चाहिए। लेकिन, इसके उलट आयोग की प्रक्रिया में इतने छेद हैं कि वोट बैंक में छेड़छाड़ करना बेहद आसान हो जाता है। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि कई जगह बोगस मतदाता सूची में बने रहते हैं और असली मतदाताओं के नाम डिलीट कर दिए जाते हैं—वह भी बिना किसी सूचना के, बिना किसी डिजिटल ट्रेल के। उनका आरोप है कि आयोग का यह रवैया सक्षम करता है कि बीजेपी और सत्ता पक्ष को वोटर लिस्ट में की जाने वाली सर्जरी का सीधे लाभ मिले, क्योंकि प्रभावित मतदाताओं को मतदान के दिन पता चलता है कि उनका नाम सूची में है ही नहीं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह उठाया जा रहा है कि जब चुनाव आयोग आधुनिक तकनीक से लैस होने का दावा करता है, तो फिर सरल और प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए जाते? विपक्ष पूछ रहा है कि क्यों न मतदान से 1-2 महीने पहले वोटर सूची को फ्रीज़ किया जाए, ताकि राजनीतिक दल, उम्मीदवार और नागरिक अपनी स्थिति को स्पष्ट रूप से जान सकें? ये भी सवाल उठता है कि डुप्लीकेट वोटरों को हटाने के लिए तकनीकी सॉफ्टवेयर का उपयोग क्यों नहीं किया जाता, जबकि देश के हर क्षेत्र में सरकारी संस्थान इस तकनीक पर चल रहे हैं? अगर आधार, पैन और बैंकिंग तक में डुप्लीकेशन हटाने के सख्त नियम लागू हो सकते हैं — तो लोकतंत्र की सबसे मूलभूत नींव, यानि वोटर लिस्ट पर ऐसा क्यों नहीं हो रहा?
विपक्षी दलों का यह मानना है कि यह शिथिलता, यह अस्पष्टता और यह चयनात्मक बदलाव किसी अनजाने भूल का हिस्सा नहीं, बल्कि चुनावी हेरफेर की भूमि तैयार करने का तरीका है। आरोपों में कहा गया है कि जब पारदर्शिता नहीं होती, तो सत्ता की पहुँच उन तंत्रों तक बढ़ जाती है जहाँ सूची में एक नाम जोड़ना या हटाना — चुनाव का पूरा गणित बदल सकता है। यदि वोटर लिस्ट का आंकड़ा सही और सुरक्षित न हो, तो लोकतंत्र का भविष्य भी सुरक्षित नहीं कहा जा सकता।
चुनाव आयोग ने इन आरोपों पर अपनी तरफ़ से किसी विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन सवाल लगातार बढ़ रहे हैं। विपक्ष का दावा है कि अगर आयोग निष्पक्ष है, तो पारदर्शिता लागू करने में किस बात का डर है? जब तक सभी सूचियाँ सार्वजनिक नहीं होंगी, जब तक अंतिम क्षणों की छेड़छाड़ बंद नहीं होगी और जब तक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर समयबद्ध अपडेट उपलब्ध नहीं होगा — तब तक लोकतंत्र की प्रामाणिकता संदेह के घेरे से बाहर नहीं आएगी। यह मुद्दा सिर्फ एक राज्य या एक चुनाव भर का नहीं — बल्कि भारत के मतदान अधिकार की पवित्रता का है। और जब अधिकार असुरक्षित हो जाए — तो सत्ता का हर दावा संदिग्ध हो जाता है।




