बिहार की धरती पर जब राहुल गांधी ने जनता के बीच खड़े होकर यह कहा कि — “मेरा वादा है, बिहार में दुनिया की सबसे बेहतरीन यूनिवर्सिटी बनेगी… नालंदा जैसा गौरव फिर से लौटेगा…” — तो भीड़ में जोश था, तालियां थीं और एक उम्मीद की लौ थी कि शायद कोई तो नेता है जो बिहार को सिर्फ जाति और वोट के तराजू से नहीं, ज्ञान और गौरव के प्रतीक के रूप में देखना चाहता है। राहुल ने जिस “नए नालंदा” का सपना बोला, उसमें शिक्षा की शक्ति थी, और इतिहास से सीखने की प्रेरणा भी।
लेकिन जैसे ही यह बात देशभर में गूंजी, वहीं से निकले “फर्जी ज्ञान के ठेकेदार” — राकेश सिन्हा, जो दो-दो जगह से वोट डालने वाले ‘ज्ञानी प्रोफेसर’ के नाम से कुख्यात हो चुके हैं। उन्होंने तुरंत शोर मचा दिया — “हिम्मत नहीं है राहुल गांधी की कि बख्तियार खिलजी का नाम लें, जिसने नालंदा जलाया!” और फिर वही पुरानी रट — “उन्हें इतिहास की तारीख तक नहीं पता।”
यानी जिनकी अपनी राजनीतिक जीवन की डिग्री फर्जी और दोहरे वोट की स्याही से दागदार है, वे देश को इतिहास सिखाने निकले हैं! लेकिन इस बार मैदान में उतरे वरिष्ठ पत्रकार डॉ. मुकेश कुमार, जिन्होंने अपने तथ्य और तर्क से सिन्हा के उस “नकली ज्ञान” को चीर कर रख दिया।
मुकेश कुमार ने करारा जवाब दिया — “काहे के प्रोफेसर हो राकेश सिन्हा? इतना भी नहीं जानते कि बख्तियार खिलजी तो बिहार गया ही नहीं था!” उन्होंने इतिहास के पन्नों से सटीक तथ्य रखे — “नालंदा विश्वविद्यालय को किसी मुस्लिम आक्रांता ने नहीं जलाया था। उसे नष्ट किया था उन ब्राह्मणों ने जिन्हें बौद्ध धर्म के विस्तार से खतरा महसूस हो रहा था।”
यह बयान सिर्फ एक जवाब नहीं था — यह उस छिपाए गए इतिहास का उद्घाटन था जिसे सदियों से धार्मिक प्रोपेगेंडा और झूठे गौरवगान की परतों के नीचे दबा दिया गया। मुकेश कुमार ने आगे कहा — “ब्राह्मणवादी शक्तियों ने सिर्फ नालंदा ही नहीं, हजारों बौद्ध विहारों को जलाया, मठों को नष्ट किया और लाखों बौद्ध भिक्षुओं का नरसंहार किया। यह इतिहास है, टीवी डिबेट का ज्ञान नहीं।”
इतिहासकारों का भी कहना है कि 12वीं शताब्दी में नालंदा का पतन बख्तियार खिलजी के कारण नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक टकराव और उस समय की ब्राह्मणिक प्रतिशोध भावना के चलते हुआ था। बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव से डरी कट्टर शक्तियों ने मठों और विश्वविद्यालयों को ध्वस्त किया ताकि “ज्ञान पर एकाधिकार” फिर से उनके हाथ में लौट आए। यह वही दौर था जब बौद्ध धर्म को भारत से लगभग मिटा दिया गया और उसकी जगह धर्म के नाम पर पाखंड और पदानुक्रम का राज स्थापित किया गया।
मुकेश कुमार का यह जवाब इसलिए भी ऐतिहासिक था क्योंकि उन्होंने उस तथाकथित “राष्ट्रवादी इतिहास” को नंगा कर दिया, जो हर तथ्य को अपने राजनीतिक एजेंडे के अनुसार रंग देता है। आज जो लोग राहुल गांधी के “नए नालंदा” के सपने का मज़ाक उड़ा रहे हैं, वही लोग उस सच्चाई से डरते हैं कि अगर बिहार फिर से ज्ञान का केंद्र बना, तो उनकी अंधभक्ति और अज्ञान की राजनीति धराशायी हो जाएगी।
दरअसल, राहुल गांधी का बयान सिर्फ एक वादा नहीं था — वह बिहार की सभ्यता, शिक्षा और सहिष्णुता की परंपरा को पुनर्जीवित करने की पुकार थी। और राकेश सिन्हा जैसे छद्म बुद्धिजीवी उसी परंपरा के विरोधी हैं। वे चाहते हैं कि नालंदा का नाम सिर्फ किसी ‘आक्रांता’ के नाम से जुड़ा रहे ताकि नफ़रत की राजनीति चलती रहे।
मुकेश कुमार ने जिस साहस से यह कहा कि “नालंदा को जलाने वाले खिलजी नहीं, ब्राह्मण थे,” उसने एक बार फिर साबित कर दिया कि सच्चाई हमेशा ‘शोर’ पर भारी पड़ती है। और यही सच्चाई है कि आज भी बिहार की जनता जानती है — नालंदा की राख से फिर वही लौ उठेगी जो कभी ज्ञान, विज्ञान और मानवता का प्रतीक थी।
राहुल गांधी का यह सपना कि “बिहार से फिर दुनिया सीखेगी” अब सिर्फ एक चुनावी लाइन नहीं रही, एक ऐतिहासिक संकल्प बन गया है। और जो लोग इस सपने से डरते हैं — वे वही हैं जो नालंदा के ज्ञान की नहीं, उसकी राख की राजनीति करते हैं।




