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दो दशक बाद तिरंगा विवाद फिर चर्चा में—RSS पर राष्ट्रध्वज से असहज रहने के पुराने आरोप दोबारा उठे

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एबीसी डेस्क 11 दिसंबर 2025

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के नागपुर स्थित रेशीमबाग मुख्यालय में 26 जनवरी 2001 को हुए तिरंगा विवाद की कहानी एक बार फिर चर्चा में है। लगभग 24 वर्ष पुराने इस मामले में तीन कार्यकर्ताओं—बाबा मेंधे, रमेश कालंबे और दिलीप चट्ठानी—पर आरोप था कि वे जबरन RSS परिसर में घुसे और देशभक्ति के नारे लगाते हुए राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया। यह घटना उस समय बड़े राजनीतिक विवाद में बदल गई थी, क्योंकि RSS पर वर्षों से एक धारणा बनाई जाती रही थी कि संगठन अपने मुख्यालय में नियमित रूप से तिरंगा नहीं फहराता।

इस घटना का कानूनी सफर 2013 में खत्म हुआ, जब नागपुर की अदालत ने आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। कोर्ट के निर्णय ने साफ किया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि कार्यकर्ताओं ने किसी प्रकार का दुराशय या हिंसक प्रवेश किया था। कार्यकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने सिर्फ गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया, जो किसी भी भारतीय का संवैधानिक अधिकार है। वहीं, RSS की ओर से इस घटना को अपने निजी परिसर में घुसपैठ और अवैध गतिविधि बताया गया। परिसर के तत्कालीन प्रभारी सुनील कठले ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि यह जबरन प्रवेश और संगठनात्मक कार्यों में बाधा डालने की कोशिश थी।

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उस समय लागू ‘फ्लैग कोड’ से जुड़ा था। 2002 में नियमों में बदलाव से पहले, निजी संपत्तियों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए निर्धारित तारीख, समय और प्रक्रियाओं का पालन अनिवार्य था। RSS ने अदालत में तर्क दिया कि उस समय के नियमों के मुताबिक मुख्यालय जैसी निजी संपत्ति पर अनियमित ध्वज प्रदर्शन कानूनी रूप से उचित नहीं था। लेकिन कार्यकर्ताओं का कहना था कि RSS जैसी राष्ट्रवादी संगठन के मुख्यालय में तिरंगा फहराने पर आपत्ति स्वयं में प्रश्न खड़ा करती है।

2002 में फ्लैग कोड में संशोधन के बाद RSS ने 26 जनवरी और 15 अगस्त को अपने मुख्यालय में नियमित रूप से ध्वज फहराना शुरू किया। हालांकि, यह घटना लंबे समय तक RSS की तिरंगा परंपरा और राष्ट्रवाद की व्याख्या को लेकर बहस का केंद्र बनी रही। कई राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने RSS की आलोचना की थी कि स्वतंत्रता के बाद से संगठन राष्ट्रीय ध्वज को लेकर अस्पष्ट या असहज रहा है।

आज जब यह मामला फिर सोशल मीडिया और राजनीतिक बहसों में उछाला जा रहा है, तो यह सिर्फ एक कानूनी घटना की याद नहीं, बल्कि उस दौर की विचारधारात्मक लड़ाई की याद दिलाता है, जिसमें तिरंगा—जो राष्ट्र की एकता और गौरव का प्रतीक है—ही राजनीतिक दलों और संगठनों के बीच बहस का विषय बन गया था।

रेशीमबाग की 2001 घटना भारतीय राजनीति के उस दौर का प्रतिनिधित्व करती है, जब राष्ट्रवाद की परिभाषाएँ, प्रतीकों का सम्मान और संगठनात्मक परंपराएँ लगातार सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा थीं—और आज भी इन सवालों का इस्तेमाल राजनीतिक आक्रामकता के हथियार के रूप में किया जाता है।

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