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बीजिंग से लौटते ही ट्रंप का ताइवान कार्ड: 50 साल पुरानी अमेरिकी नीति पर सबसे बड़ा सवाल

अंतरराष्ट्रीय / अमेरिका-चीन / भू-राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन/बीजिंग | 22 मई 2026

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन दौरे से लौटते ही ऐसा संकेत दिया है जिसने वैश्विक कूटनीति और एशियाई भू-राजनीति में हलचल मचा दी है। ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते से सीधे बातचीत की इच्छा जताकर ट्रंप ने उस संवेदनशील मुद्दे को छू लिया है जिसे पिछले लगभग पांच दशकों से अमेरिकी राष्ट्रपति बेहद सावधानी से संभालते रहे हैं। चीन ने इसे अपनी “रेड लाइन” माना है और बीजिंग पहले ही साफ कर चुका है कि ताइवान उसका “कोर इंटरेस्ट” है, जिस पर वह किसी भी प्रकार की बाहरी दखलअंदाजी स्वीकार नहीं करेगा।

दरअसल 1979 से अमेरिका आधिकारिक रूप से “वन चाइना पॉलिसी” का पालन करता आया है। इसी नीति के तहत वॉशिंगटन ने ताइवान के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध खत्म कर बीजिंग को चीन की वैध सरकार के रूप में मान्यता दी थी। तब से लेकर आज तक अमेरिकी राष्ट्रपति ताइवान के शीर्ष नेतृत्व से प्रत्यक्ष संवाद से बचते रहे, ताकि चीन के साथ सीधा टकराव न हो। लेकिन ट्रंप का ताजा संकेत इस लंबे कूटनीतिक संतुलन को चुनौती देता दिखाई दे रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह कदम केवल एक फोन कॉल या कूटनीतिक शिष्टाचार भर नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की बदलती रणनीतिक सोच का संकेत भी हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक, दक्षिण चीन सागर, सेमीकंडक्टर उद्योग और सैन्य प्रभाव को लेकर तनाव लगातार बढ़ा है। ऐसे माहौल में ताइवान अब केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का सबसे संवेदनशील केंद्र बन चुका है।

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बीजिंग ने ट्रंप के संकेत पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। चीनी विदेश मंत्रालय ने अमेरिका को “आग से न खेलने” की चेतावनी देते हुए कहा कि ताइवान से जुड़ी किसी भी आधिकारिक बातचीत को चीन अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ मानता है। चीन का आरोप है कि अमेरिका ताइवान को सैन्य और राजनीतिक समर्थन देकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर रहा है। दूसरी ओर ताइवान इस पूरे घटनाक्रम को अपने लिए बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में देख रहा है।

इस बीच ताइवान की संसद द्वारा लगभग 25 बिलियन डॉलर के विशाल रक्षा पैकेज को मंजूरी दिए जाने ने भी संकेत दिया है कि क्षेत्र में सैन्य तनाव और बढ़ सकता है। माना जा रहा है कि इस बजट का बड़ा हिस्सा अमेरिका से आधुनिक हथियारों और रक्षा तकनीक की खरीद पर खर्च होगा। चीन लंबे समय से अमेरिका पर ताइवान को हथियार देकर “प्रॉक्सी सैन्य संतुलन” बनाने का आरोप लगाता रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ट्रंप की शैली पारंपरिक अमेरिकी कूटनीति से अलग रही है। वे कई बार स्थापित वैश्विक नियमों और कूटनीतिक परंपराओं को चुनौती देते दिखाई दिए हैं। 2016 में भी उन्होंने ताइवान की तत्कालीन राष्ट्रपति का फोन कॉल स्वीकार कर चीन को चौंका दिया था। अब 2026 में उनका नया रुख यह संकेत दे रहा है कि अमेरिका “रणनीतिक अस्पष्टता” की पुरानी नीति से आगे बढ़ सकता है।

यदि अमेरिका और ताइवान के बीच शीर्ष स्तर पर सीधा संवाद स्थापित होता है, तो इसका असर केवल चीन-अमेरिका संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र, वैश्विक व्यापार मार्गों, सेमीकंडक्टर उद्योग और एशिया की सुरक्षा राजनीति पर पड़ सकता है। ताइवान दुनिया के सबसे बड़े चिप निर्माण केंद्रों में शामिल है और किसी भी सैन्य या राजनीतिक संकट का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।

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फिलहाल दुनिया की नजरें वॉशिंगटन, बीजिंग और ताइपे पर टिकी हुई हैं। सवाल केवल इतना नहीं है कि ट्रंप ताइवान के राष्ट्रपति से बात करेंगे या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या दुनिया अब अमेरिका-चीन टकराव के एक नए और अधिक आक्रामक दौर में प्रवेश कर रही है।

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