मनामा (बहरीन), 2 नवंबर 2025
अमेरिकी विदेश नीति में एक ऐतिहासिक मोड़ सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रीय खुफिया महानिदेशक तुलसी गब्बार्ड ने घोषणा की है कि अब वाशिंगटन “रिजीम चेंज” यानी दूसरे देशों की सरकारों को गिराने की नीति को हमेशा के लिए पीछे छोड़ चुका है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका अब “कूप या शासन परिवर्तन” के बजाय “कूटनीति और व्यवहारिक समझौतों” के रास्ते पर चल रहा है।
बहरीन में आयोजित 21वें मनामा संवाद सम्मेलन में बोलते हुए तुलसी गब्बार्ड ने कहा कि दशकों से चली आ रही “पुरानी वाशिंगटन सोच” ने अमेरिका को बार-बार असफल नीतियों के चक्रव्यूह में फंसा रखा था। “हमने लंबे समय तक एक ही फॉर्मूले पर काम किया — किसी देश में असहमति को उकसाना, शासन बदलना, अमेरिकी लोकतंत्र का मॉडल थोपना, और फिर उस देश को अधर में छोड़ देना,” उन्होंने कहा। “इस नीति ने हमें मित्रों से अधिक दुश्मन दिए हैं, और हमें वैश्विक स्तर पर अलग-थलग कर दिया है।”
गब्बार्ड ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि अमेरिका ने अतीत में कई बार लोकतंत्र और राष्ट्रीय हितों के नाम पर विदेशी सरकारों को गिराने का प्रयास किया — 2003 में इराक, 2011 में लीबिया, और 2014 में यूक्रेन के मैदान कूप जैसे उदाहरण इसका प्रमाण हैं। लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि ट्रंप प्रशासन ने इस “एक ही सांचे वाली नीति” को त्याग दिया है। उन्होंने कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले दिन से ही एक अलग नीति अपनाई है — जो व्यावहारिक है, सौदों पर आधारित है, और जिसका मकसद है कूटनीति के ज़रिए शांति स्थापित करना। यही है ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का असली स्वरूप।”
गब्बार्ड ने यह भी स्वीकार किया कि इस पुरानी नीति ने अमेरिका को भारी कीमत चुकानी पड़ी है — ट्रिलियनों डॉलर टैक्सपेयर्स के खर्च हुए, हजारों सैनिकों और नागरिकों की जानें गईं, और नतीजतन नई असुरक्षा व आतंकवाद की लहरें पैदा हुईं। उन्होंने कहा कि ट्रंप को जनता ने इसीलिए चुना कि वे इस विनाशकारी चक्र को तोड़ सकें — और उन्होंने ऐसा कर दिखाया है।
हालांकि आलोचक इसे संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। वे कहते हैं कि वेनज़ुएला और ईरान के प्रति ट्रंप प्रशासन का दबाव अभियान उसी पुराने “रिजीम चेंज” फार्मूले की याद दिलाता है। हाल ही में वेनज़ुएला ने आरोप लगाया कि अमेरिका उसकी सरकार गिराने की साजिश कर रहा है, जबकि ट्रंप ने सोशल मीडिया पर ईरान के संदर्भ में कहा था, “क्यों नहीं हो सकता रिजीम चेंज?” — जिससे वॉशिंगटन की नीयत पर सवाल उठे हैं।
ईरान ने इन हमलों और आर्थिक प्रतिबंधों को अपनी सरकार को अस्थिर करने की अमेरिकी साजिश करार दिया है। तेहरान का कहना है कि अमेरिका अपने “लोकतंत्र निर्यात मॉडल” की असफलता के बावजूद अब भी वही पुरानी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त है।
फिर भी, तुलसी गब्बार्ड के इस बयान को अमेरिकी विदेश नीति के एक “सैद्धांतिक बदलाव” के रूप में देखा जा रहा है। उनके मुताबिक, अब वॉशिंगटन का ध्यान शासन परिवर्तन पर नहीं, बल्कि साझेदारियों और संवाद के ज़रिए वैश्विक स्थिरता पर है। यह वही दृष्टिकोण है जिसे ट्रंप बार-बार “शांति के सौदे” कहकर प्रचारित करते आए हैं — और जिसके लिए वे स्वयं को नोबेल शांति पुरस्कार का दावेदार मानते हैं।
इस घोषणा के बाद पश्चिम एशिया से लेकर लैटिन अमेरिका तक कई राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है कि क्या वाकई अमेरिका ने अपनी दशकों पुरानी रणनीतिक प्रवृत्ति को बदला है — या यह सिर्फ “नए आवरण में पुरानी नीति” है। फिलहाल इतना तय है कि तुलसी गब्बार्ड का यह बयान अमेरिकी विदेश नीति की दिशा को लेकर एक बड़ा संकेत है, जो आने वाले महीनों में वैश्विक कूटनीति के स्वरूप को गहराई से प्रभावित कर सकता है।




