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“स्खलन हुआ, पर प्रवेश नहीं”—क्या यह व्याख्या न्याय की भावना से मेल खाती है?

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एबीसी नेशनल न्यूज | रायपुर | 20 फरवरी 2026

हाल ही में Chhattisgarh High Court के न्यायमूर्ति Narendra Kumar Vyas द्वारा दिए गए एक फैसले ने देशभर में गहन बहस छेड़ दी है। वर्ष 2005 के ट्रायल कोर्ट के निर्णय के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए अदालत ने यह माना कि “प्रवेश (penetration) सिद्ध न होने” की स्थिति में दुष्कर्म (rape) का अपराध स्थापित नहीं होता, भले ही स्खलन (ejaculation) हुआ हो। अदालत ने इसी आधार पर दोषसिद्धि में संशोधन किया।

कानून की भाषा और न्याय की भावना—दोनों हमेशा एक-दूसरे के पर्याय नहीं होते। भारतीय दंड संहिता की परिभाषा ऐतिहासिक रूप से “प्रवेश” को दुष्कर्म का केंद्रीय तत्व मानती रही है, हालांकि 2013 के आपराधिक कानून संशोधन के बाद दुष्कर्म की परिभाषा व्यापक हुई है। प्रश्न यह है कि क्या किसी महिला के साथ जबरन यौन कृत्य, जिसमें स्पष्ट यौन आक्रमण और शारीरिक अपमान शामिल हो, उसे केवल “प्रवेश सिद्ध न होने” के आधार पर दुष्कर्म की श्रेणी से बाहर रखा जाना चाहिए?

यहां सबसे बड़ी चिंता सामाजिक संदेश की है। जब न्यायालय तकनीकी व्याख्या के आधार पर अपराध की प्रकृति बदलता है, तो पीड़िता के अनुभव की गंभीरता कहीं पीछे छूट जाती है। एक आम आदमी—या कहें एक आम आदमी—कानून की बारीकियों को नहीं, बल्कि परिणाम को देखता है। यदि संदेश यह जाए कि “प्रवेश नहीं हुआ तो दुष्कर्म नहीं,” तो इससे अपराधियों का मनोबल बढ़ने का खतरा पैदा होता है। ऐसे निर्णय को गलत तरीके से समझकर कुछ लोग यह सोच सकते हैं कि वे ‘सीमा’ तक जाकर भी कठोर दंड से बच सकते हैं।

यह भी ध्यान रखना होगा कि अदालतें साक्ष्यों और कानून की परिभाषाओं के आधार पर निर्णय देती हैं, भावनाओं के आधार पर नहीं। लेकिन न्यायशास्त्र का एक बड़ा सिद्धांत यह भी है कि कानून की व्याख्या समय, समाज और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप होनी चाहिए। महिलाओं की गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और सुरक्षा आज भारतीय न्याय व्यवस्था के मूल संवैधानिक मूल्य हैं। यदि किसी निर्णय से यह आशंका पैदा होती है कि यौन हिंसा के कुछ रूप ‘कम गंभीर’ माने जा रहे हैं, तो यह चिंता का विषय है।

ऐसे मामलों में अंतिम व्याख्या का अधिकार अंततः Supreme Court of India के पास होता है। यदि समाज के बड़े हिस्से को लगता है कि कानून की मौजूदा भाषा या उसकी व्याख्या पीड़िताओं के हितों की पर्याप्त रक्षा नहीं कर पा रही, तो या तो उच्चतर न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिए या विधायिका को स्पष्ट संशोधन करना चाहिए।

यह बहस किसी एक व्यक्ति या एक अदालत के खिलाफ नहीं, बल्कि उस व्यापक प्रश्न पर है कि यौन अपराधों की परिभाषा और सजा तय करते समय प्राथमिकता किसे मिले—तकनीकी तत्वों को या पीड़िता की गरिमा और अनुभव को? न्याय का उद्देश्य केवल अपराध की श्रेणी तय करना नहीं, बल्कि समाज में यह स्पष्ट संदेश देना भी है कि किसी भी प्रकार की यौन हिंसा अस्वीकार्य है।

अगर कानून की व्याख्या से यह आशंका पैदा होती है कि अपराधी दंड से बचने के रास्ते खोज लेंगे, तो यह विधायिका और न्यायपालिका—दोनों के लिए पुनर्विचार का क्षण है। क्योंकि अंततः न्याय केवल फैसला नहीं, बल्कि समाज में भरोसे का आधार भी होता है।

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