अनिल यादव | लखनऊ 22 नवंबर 2025
उत्तर-प्रदेश में जारी Special Intensive Revision (SIR) के बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राज्य सरकार और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि भाजपा सरकार एवं चुनाव आयोग मिलकर प्रत्येक विधानसभा सीट पर करीब 50 हजार से अधिक मतदाता-नाम काटने की साजिश रच रहे हैं, ताकि आगामी 2027 विधानसभा निर्वाचन में विपक्षी मतदाताओं का प्रभाव कम किया जा सके।
यादव ने कहा है कि यह प्रक्रिया सिर्फ नामांकन-विरुद्ध नहीं बल्कि संरचित रणनीति का हिस्सा है, जिसमें SIR का इस्तेमाल “वोटर सुची साफ-सफाई” नाम से किया जा रहा है, लेकिन वास्तव में विपक्षी वोटबैंक को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि यह विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर केंद्रित है जहाँ INDIA गठबंधन और समाजवादी पार्टी ने 2024 लोकसभा में प्रदर्शन बेहतर किया था।
उन्होंने आगे कहा कि चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित समयरेखा बेहद तंग है, टिप्पणियों-प्रतिक्रियाओं के लिए पर्याप्त अवसर नहीं दिए गए हैं तथा बूथ-स्तर पर जनहित में नामांकन, नाम हटवाने और सुधारप्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है। इस कारण उन्होंने समय बढ़ाने तथा SOP (मानक कार्यप्रणाली) में बदलाव की मांग की है ताकि मतदाता-सूची में शामिल होने एवं कायम रहने वाले नागरिकों के अधिकार सुरक्षित हो सकें।
राजनीतिक विश्लेषक इस मामले को सिर्फ वोटर-सूची की तकनीकी प्रक्रिया तक सीमित नहीं मान रहे हैं — उनका कहना है कि यह आगामी विधानसभा-चुनावों की दिशा को प्रभावित करने वाला एक रणनीतिक कदम हो सकता है। यदि वास्तव में प्रति सीट इतने बड़े पैमाने पर मतदाता नाम हटाए जाते हैं, तो यह लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा, विपक्ष की क्षमता, तथा राजनीतिक समीकरणों में व्यापक असर डाल सकता है।
हालाँकि, भाजपा और चुनाव आयोग ने इस दावे पर अभी तक सार्वजनिक स्तर पर विस्तृत जवाब नहीं दिया है — ऐसा लगता है कि दोनों पक्ष इस विषय को लेकर फिलहाल चुप्पी बनाए हुए हैं। इस बीच, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि SIR प्रक्रिया में कितनी नामांकन कृषि-तीव्रता से आगे बढ़ती है, कितने नाम वाकई हटते हैं, और किस प्रकार से न्यायायिक या संवैधानिक समीक्षा इस बारे में सामने आती है।
अगले कुछ सप्ताह में जब SIR-प्रक्रिया आगे बढ़ेगी और नामांकन-सूची सार्वजनिक होंगी, तब यह स्पष्ट होगा कि वास्तव में कितनी संख्या में मतदाता नामांकन-सूची से हटे हैं, और इसका मतदान-दिन पर प्रभाव क्या होगा। इस तरह यह मामला सिर्फ प्रशासनिक नहीं—बल्कि चुनाव-रणनीति, राजनीतिक संतुलन और लोकतंत्र के स्वास्थ्य का परीक्षण बन गया है।




