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वेस्ट एशिया संकट का असर सड़कों पर, लंबी कतारें, बढ़ती कीमतें और ठप पड़ती रोज़ी-रोटी, शहर छोड़ गांव जाते परिवार

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ओपिनियन/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अप्रैल 2026

रसोई तक पहुंचा युद्ध का असर

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव—Iran, Israel और United States के बीच टकराव—अब सिर्फ अंतरराष्ट्रीय खबर नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर सीधे भारत के घर-घर में महसूस किया जा रहा है। Strait of Hormuz जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर संकट ने सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे भारत जैसे बड़े LPG आयातक देश की स्थिति कमजोर पड़ गई है। जो गैस सिलेंडर कभी एक नियमित घरेलू जरूरत था, वही आज संघर्ष का प्रतीक बन गया है, और आम आदमी के लिए रसोई चलाना एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

सड़कों पर इंतज़ार और बेबसी की तस्वीर

Delhi, Mumbai, Kolkata, Ahmedabad और Lucknow जैसे बड़े शहरों में सुबह से लेकर देर रात तक एक ही दृश्य देखने को मिल रहा है—लोग खाली सिलेंडर लेकर लंबी कतारों में खड़े हैं, आंखों में चिंता और चेहरे पर थकान साफ दिखाई देती है। 25 से 45 दिन का इंतजार अब सामान्य बात हो गई है, जबकि कई जगहों पर एक-एक सिलेंडर पाने में महीने भर का समय लग रहा है। कमर्शियल LPG की कीमत ₹2,000 के पार पहुंच चुकी है, जिससे होटल, ढाबे और छोटे व्यवसाय चलाना लगभग असंभव हो गया है। यह सिर्फ महंगाई नहीं, बल्कि व्यवस्था के चरमराने की तस्वीर है।

रोज़गार पर सीधा हमला और बंद होते छोटे कारोबार

इस संकट का सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ा है, जिनकी रोज़ी-रोटी सीधे LPG पर निर्भर करती है। छोटे होटल, चाय की दुकानें, स्ट्रीट फूड वेंडर और ढाबे—जो शहरों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं—आज या तो बंद हो चुके हैं या आधे-अधूरे चल रहे हैं। गैस नहीं है तो खाना नहीं बन सकता, और खाना नहीं तो ग्राहक नहीं। ऐसे में हजारों परिवारों की आय अचानक रुक गई है। यह संकट धीरे-धीरे एक आर्थिक आपदा का रूप लेता दिख रहा है, जहां सबसे ज्यादा मार निम्न और मध्यम वर्ग पर पड़ रही है।

शहरों से गांव की ओर मजबूरी का पलायन

Surat के टेक्सटाइल उद्योग से लेकर Mumbai के निर्माण स्थलों और Delhi की फैक्ट्रियों तक, हजारों मजदूर अब शहर छोड़ने लगे हैं। यह दृश्य कहीं न कहीं COVID-19 pandemic के दौर की याद दिलाता है, जब लोग मजबूरी में अपने गांवों की ओर लौटे थे। आज भी स्थिति कुछ वैसी ही बनती जा रही है—गैस की कमी, बढ़ता खर्च और घटती आमदनी ने मजदूरों को यह फैसला लेने पर मजबूर कर दिया है कि शहर में भूखे रहने से बेहतर है गांव लौट जाना, भले ही वहां भी निश्चित भविष्य न हो।

भूख, धुआं और बढ़ती कालाबाज़ारी

जब रसोई में गैस नहीं होती, तो परिवारों को पुराने और अस्वास्थ्यकर तरीकों की ओर लौटना पड़ता है। कई घरों में महिलाएं लकड़ी और कोयले से खाना बना रही हैं, जिससे न सिर्फ स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है बल्कि पर्यावरण भी प्रभावित हो रहा है। बच्चों की आंखों में भूख और बुजुर्गों के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई देती है। दूसरी तरफ, इस संकट का फायदा उठाकर कालाबाजारी भी तेजी से बढ़ रही है, जहां एक सिलेंडर के लिए कई गुना कीमत वसूली जा रही है। यह स्थिति आम आदमी के लिए दोहरी मार बन गई है—एक तरफ कमी, दूसरी तरफ महंगाई।

सरकारी दावे और ज़मीनी सच्चाई का फर्क

सरकार की ओर से लगातार यह कहा जा रहा है कि स्थिति नियंत्रण में है और सप्लाई पर्याप्त है। Narendra Modi ने भी लोगों से घबराने की अपील की है और वैकल्पिक उपायों पर जोर दिया है। लेकिन सड़कों पर खड़ी लंबी कतारें और खाली रसोई इस दावे से मेल नहीं खातीं। योजनाएं बन रही हैं—स्ट्रेटेजिक रिजर्व, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत और नए आयात मार्ग—लेकिन इनका असर जमीन पर कब दिखेगा, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।

संकट सिर्फ गैस का नहीं, व्यवस्था का है

यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ LPG की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की भी परीक्षा है, जो आम आदमी की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए जिम्मेदार है। एक तरफ वैश्विक राजनीति का दबाव है, दूसरी तरफ घरेलू स्तर पर बढ़ती परेशानियां। आम आदमी आज रोटी, रोज़ी और उम्मीद के बीच फंसा हुआ है। सवाल यही है कि क्या हालात जल्द सुधरेंगे या यह संकट और गहराता जाएगा—और तब तक कितने परिवार इसकी कीमत चुकाते रहेंगे।

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