दादरी के बिसाहड़ा गांव में 2015 में हुई एक ऐसी भयावह घटना, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था, आज एक बार फिर सुर्खियों में है। उस समय 52 वर्षीय मोहम्मद अख़लाक़—एक साधारण मुस्लिम किसान—को भीड़ ने “बीफ़ रखने” की अफवाह पर बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला था। बाद में फोरेंसिक जांच में साफ़ हो गया था कि वह मांस बीफ़ नहीं, बल्कि बकरे का था। देशभर में इस घटना ने बवाल मचा दिया था, भीड़तंत्र और गौ-रक्षा हिंसा पर राष्ट्रीय शर्मिंदगी महसूस की गई थी, और तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसकी निंदा की थी। पर अब, घटना के 10 साल बाद, उत्तर प्रदेश सरकार ने अदालत में याचिका दाखिल कर सभी आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने का फैसला किया है—एक ऐसा कदम जिसने फिर से राजनीति, समाज और इंसाफ़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह निर्णय अक्टूबर 2025 में राज्य सरकार द्वारा दाखिल एक आधिकारिक आवेदन के रूप में सामने आया, जो वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रशासन के निर्देश पर आधारित बताया जा रहा है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब केस की सुनवाई अब भी जारी है और अदालत में कई अहम गवाहियां पेश होनी बाकी हैं। सरकार के इस कदम पर विभाजित प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं—एक तरफ आरोपियों के समर्थक इसे “न्याय” कह रहे हैं, जबकि दूसरी ओर पीड़ित परिवार इसे इंसाफ़ के खिलाफ बड़ी साजिश बता रहा है। सबसे कड़ा विरोध मोहम्मद अख़लाक़ के बेटे दानिश ने जताया है, जिन्होंने साफ कहा है कि वे इस फैसले को अदालत में चुनौती देंगे, क्योंकि “मेरे पिता को भीड़ ने मारा था—और उसी भीड़ को आज सरकार बचा रही है।”
इस मामले की जड़ में सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि भीड़ द्वारा न्याय करने की सोच, धार्मिक उन्माद और राज्य के रवैये का बड़ा सवाल छिपा हुआ है। 2015 की रात, 1,000 से ज्यादा गांववालों का हुजूम अख़लाक़ के घर जुटा था। उन्हें न सिर्फ पीटा गया, बल्कि उनके परिवार के अन्य सदस्यों पर भी जानलेवा हमला हुआ। इस केस ने पहली बार पूरी दुनिया को दिखाया कि भारत में “काऊ विजिलेंटिज़्म” किस हद तक हिंसक और संगठित रूप ले सकता है। उस समय पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया था, और घटना को “भीड़ द्वारा हत्या” (lynching) की श्रेणी में माना गया था। लेकिन धीरे-धीरे माहौल बदला, आरोपियों को राजनीतिक संरक्षण मिला, उन्हें जेल से छूटते ही मालाएं पहनाकर स्वागत किया गया—यह तस्वीरें आज भी इंटरनेट पर मौजूद हैं।
सरकार द्वारा आरोप हटाने की कार्रवाई के बाद, एक बड़ा सवाल जो उठ रहा है वह यह है कि—क्या भीड़तंत्र को अब परोक्ष रूप से वैधानिक सुरक्षा दी जा रही है? क्या यह संदेश नहीं दिया जा रहा कि अफवाहें फैलाकर, धार्मिक हिंसा भड़काकर हत्या कर देना भी “माफ़” किया जा सकता है? यह सवाल सिर्फ अख़लाक़ के परिवार का नहीं, बल्कि हर उस भारतीय का है जो कानून के राज में विश्वास करता है। जिस केस को कभी भारत में भीड़ हिंसा के खिलाफ जागरूकता का प्रतीक माना गया था, आज वही केस राजनीतिक विवाद और संस्थाओं की भूमिका पर गहरे संदेह खड़े कर रहा है।
इस याचिका की टाइमिंग भी संयोग नहीं दिखती—चुनावों के ठीक बाद, राजनीतिक ध्रुवीकरण चरम पर, और उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था लगातार आलोचना के घेरे में। विपक्ष का कहना है कि सरकार यह कदम “वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए” उठा रही है और इससे राज्य में भीड़ हिंसा को और बढ़ावा मिल सकता है। कई विधि विशेषज्ञों ने भी चेतावनी दी है कि यदि ऐसे मामलों में सरकार खुद सामने आकर आरोप हटाने की सिफारिश करने लगे, तो यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और आपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को कमजोर कर देगा।
अख़लाक़ के बेटे दानिश का बयान पूरे मामले का सबसे मार्मिक हिस्सा है—“मेरे पिता को सिर्फ अफ़वाह पर मार दिया गया था। अब दस साल बाद सरकार कह रही है कि किसी की गलती नहीं थी? क्या यह न्याय है? क्या मैं अपने पिता की हत्या भी भूल जाऊँ?” दानिश का यह दर्द न सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि यह बताता है कि भारत में भीड़तंत्र के पीड़ितों को न्याय की राह कितनी लंबी और कितनी टूटी-फूटी मिलती है।
अंततः यह मामला सिर्फ एक पुराने केस का तकनीकी निर्णय नहीं है—यह भारत में कानून और भीड़, न्याय और राजनीति, संविधान और धार्मिक उन्माद के बीच चल रही लड़ाई का नवीनतम अध्याय है। सवाल यह नहीं कि सरकार ने क्या किया—सवाल यह है कि क्यों किया, किसके लिए किया, और इसका आने वाले समय में क्या संदेश जाएगा। क्या भारत में भीड़तंत्र को संवैधानिक छत्रछाया मिल रही है? या यह लोकतंत्र की आत्मा पर एक और वार है?
इस फैसले का असर आने वाले समय में गहरा होगा—कानून व्यवस्था, समाजिक सौहार्द, और भारत की न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता सब के सब इस एक केस से प्रभावित होंगे। और एक बात तो साफ है—मो. अख़लाक़ की हत्या पर 2015 में उठे सवाल आज भी वही हैं, बल्कि नए सवाल उनके ऊपर भारी पड़ रहे हैं। अब देखना यह है कि अदालत क्या फैसला देती है—क्योंकि इंसाफ़ की आखिरी उम्मीद अब सिर्फ अदालत के पास ही बची है।





अविश्वसनीय! इस रिपोर्ट को और ठोस रूप में पेश किया जाना चाहिए. सरकार का औपचारिक जवाब, वकीलों की राय, राजनैतिक नेताओं का स्टैंड ..भाववाचक नहीं, तथ्यात्मकता धार देती है.