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ग़ुलाम मीडिया का ‘महानायक’ गया, तोतारटंत का साम्राज्य ढहने लगा—हीरेन जोशी के बिना ‘ग़ुलामी मशीनरी’ अब दिशाहीन

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महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 4 दिसंबर 2025

ग़ुलाम मीडिया की सामूहिक छाती–पीट: ‘हमारा चरवाहा चला गया’

आज भारतीय मीडिया जगत का वह हिस्सा, जिसे देश भर में ‘ग़ुलाम मीडिया’, ‘गोदी मीडिया’ और ‘प्रोपेगेंडा फैक्ट्री’ के नाम से जाना जाता है, गहरे सदमे में है। कारण—इस इकोसिस्टम का असली चरवाहा, उसकी दिशा, धड़कन, कमान और ब्रीफिंग रूम का सर्वशक्तिमान नियंता हीरेन जोशी मंच से गायब हो गया है। आज यह बात साफ हो गई कि वह सिर्फ पर्दे के पीछे का आदमी नहीं था—वह वह व्यक्ति था जो पत्रकारों को यह भी बताता था कि “आज क्या सोचना है, क्या कहना है, और क्या चिल्लाना है।” उसकी विदाई से गोदी मीडिया का चामत्कारिक आत्मविश्वास टूट गया है। आज वे बेचैन हैं—‘अब स्क्रिप्ट कौन लिखेगा?’

हर युद्ध, हर झूठ, हर चमत्कार—जोशी की कलम से जन्मा कथा–वृतांत

जोशी वह ‘कहानीकार’ था जिसने मीडिया के एंकरों को यह बताया कि पाकिस्तान से लेकर नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव, तुर्की और चीन तक—हर देश को कैसे दुश्मन दिखाना है और कैसे “कथित विजय” दिखानी है। वह वह शिल्पकार था जिसने देश की असल GDP को ‘ऐसे तोड़–मरोड़ कर’ पेश कराया कि दर्शकों को लगे भारत दुनिया की सबसे तेज़ दौड़ती हुई अर्थव्यवस्था है, चाहे आंकड़े कुछ भी कहें। उसके इशारे के बिना कोई “सर्जिकल स्ट्राइक”, कोई “ड्रामा”, कोई “देश–विरोधी गैंग”, कोई “राष्ट्रवाद का महाअभिषेक” शुरू ही नहीं होता था। यह वही आदमी था जिसने हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था की धूल झाड़कर उसे टीवी स्क्रीन पर चमकता सोना बना दिया।

‘विश्वगुरु’ इमेज का असली निर्माता—गोड़ बनाकर देवता गढ़ने वाला प्रचार–महाकाव्यकार

भारतीय राजनीति में एक बात सब जानते हैं—नेता अपने पोर्टफोलियो से बड़े नहीं बनते, प्रचार से बनते हैं, और इस प्रचार का सबसे बड़ा वैज्ञानिक हीरेन जोशी था। उसने एक साधारण राजनेता को “विश्वगुरु”, “धरती का हीलर”, “सर्वज्ञानी”, “सर्वशक्तिमान” और “विश्व मंच का उद्धारक” बना कर पेश किया। आधे सच, चौथाई तथ्य और ज़ीरो पारदर्शिता से बने इस महानायक की प्रतिमा हर दिन मीडिया पर चमकती रही। यह चमत्कार सिर्फ विज्ञापन नहीं—यह एक प्रचार–यंत्र था, और उसका मुख्य इंजीनियर जोशी था।

हर ब्रेकिंग न्यूज़—जो कुछ भी न तोड़े; हर बहस—जो कुछ भी न बहस करे

गोदी मीडिया का पूरा तंत्र यह मानकर चल रहा था कि बहसें बस चिल्लाने के लिए होती हैं, ब्रेकिंग न्यूज़ बस नशे की खुराक के लिए, और सुर्खियाँ सिर्फ आराधना के लिए—यह सब जोशी की सूक्ष्म रणनीति का हिस्सा था। वह वह आदमी था जो यह तय करता था कि कौन-सा मुद्दा उठाना है और कौन-सा मुद्दा पूरी तरह दफन कर देना है। वास्तव में ‘समाचार’ नहीं, बल्कि भय, भ्रम, विभाजन और प्रशंसा—ये चार स्तंभ ही थे जिन पर जोशी की मीडिया–दुनिया टिकी थी। अब उसके बिना यह इमारत हिलने लगी है। जो एंकर पहले बोलने के लिए स्क्रिप्ट की तरफ देखते थे—अब वे ही पूछ रहे हैं: “अब हम किसके इशारे पर चिल्लाएँ?”

WhatsApp University का ‘कुलपति’ चला गया—अब पाठ्यक्रम कौन लिखेगा?

हमारी ‘WhatsApp यूनिवर्सिटी’—जहाँ हर दिन हजारों नकली खबरें, सांप्रदायिक कहानियाँ और काल्पनिक राष्ट्रवाद की डोज़ बनाई जाती थी—उसकी पाठ्यपुस्तकें भी हीरेन जोशी ही तैयार करवाता था। आज उसकी विदाई के साथ इस विशाल फेक–फैक्टरी का भविष्य अनिश्चित है। गोदी मीडिया और WhatsApp University दोनों अब यह प्रश्न पूछ रहे हैं—“पाठ्यक्रम कौन अपडेट करेगा? अगला नैरेटिव कौन बनाएगा? झूठ को कैसे पैक किया जाए?” उनकी मौजूदा हालत वैसी ही है जैसे किसी विद्यालय से प्रधानाचार्य भाग जाए—और विद्यार्थी भ्रमित खड़े रह जाएँ।

क्या अमित मालवीय इस ‘भारी विरासत’ को उठा पाएँगे?

सोशल मीडिया सेना, बॉट–फैक्टरी और आईटी सेल—सबमें यह चर्चा तेज़ है कि अब जोशी की जगह कौन लेगा। क्या अमित मालवीय यह जिम्मेदारी निभा पाएँगे? क्या वे उतनी ही शैली, उतनी ही आक्रामकता और उतना ही छद्म–प्रचार संभाल पाएँगे? यह बड़ा सवाल है, क्योंकि प्रचार–युद्ध की दुनिया में जोशी का अनुभव और नियंत्रण असाधारण था। उसके जाने से एक शून्य पैदा हो गया है—और यह शून्य शायद लंबे समय तक भर नहीं पाएगा।

क्या वह देश छोड़कर भाग चुके हैं? जनता पूछ रही है—“कहाँ हैं जोशी?”

आज यह खबर भी सामने आ रही है कि हीरेन जोशी देश छोड़कर भाग चुके हैं। अगर यह सच है, तो बड़ा सवाल यह है—“उन्होंने किस देश में शरण ली है?” क्या अश्वनी वैष्णव के पास इसका जवाब है? क्या सरकार बताएगी कि वह कहाँ हैं और क्यों गए? या फिर यह भी एक और रहस्य बनकर फाइलों में दफन हो जाएगा?

एक युग का अंत, लेकिन सवालों के तूफान का आरंभ

हीरेन जोशी के जाने से सिर्फ गोदी मीडिया ही नहीं हिला—बल्कि वह पूरा प्रचार–यंत्र हिल गया है जो लोकतंत्र के नाम पर लोगों के दिमाग में भ्रम बोता था, नफ़रत परोसता था और झूठ को चांदी की प्लेट में सजाकर पेश करता था। उसकी विदाई से एक युग खत्म हुआ है, परंतु उसके द्वारा बनाई गई झूठ की मशीनरी अब रसातल की ओर गिरने लगी है। और इस बीच देश का सबसे बड़ा सवाल यही है— “सच लौटेगा कब?”

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