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रोहिणी–तेजस्वी टकराव से RJD में भूचाल, हार के बाद खुला परिवारवाद का घाव

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पटना 17 नवंबर 2025

बिहार की राजनीति में इन दिनों एक अलग ही हलचल मची हुई है। लोकसभा चुनाव के बाद से ही राजद (RJD) नेतृत्व, परिवार के भीतर की खींचतान और तेजस्वी यादव को लेकर नए विवाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक गरमाए हुए हैं। रोहिणी आचार्य द्वारा चुनाव परिणामों के बाद लगाए गए आरोपों और परिवार से दूरी बनाने के फैसले ने बहस को और तेज कर दिया है। उनके इस कदम ने न सिर्फ पार्टी के भीतर तनाव बढ़ाया है बल्कि महागठबंधन की हार पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजनीतिक विश्लेषणों में कहा जा रहा है कि चुनाव के वक्त रोहिणी लगातार तेजस्वी पर दबाव बना रही थीं, लेकिन जैसे ही मैदान में महागठबंधन के पक्ष में माहौल बनता दिखा, वह शांत हो गईं। हालाँकि परिणाम आने के बाद आरोपों की बौछार और सार्वजनिक नाराज़गी ने एक बार फिर परिवार की एकजुटता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। सोशल मीडिया पर यह भी चर्चा है कि किडनी दान को एहसान बनाकर राजनीति में सौदेबाज़ी करना रोहिणी की छवि को उलटा नुकसान पहुँचा रहा है। कमेंटेटर्स का कहना है कि अगर टिकट दिया गया और वे हार गईं तो इसकी जिम्मेदारी नेतृत्व पर नहीं डाली जा सकती।

तेज प्रताप यादव को लेकर भी कड़ा आक्रोश दर्ज किया गया। कई लोगों ने सवाल उठाया कि चुनाव अभियान के बीच में निजी तस्वीरें वायरल करके क्या वे अनावश्यक विवाद पैदा नहीं कर रहे थे? विश्लेषक इस बात पर सहमत हैं कि जब लालू प्रसाद स्वयं जीवित हैं और परिवार के मुखिया हैं, तो निर्णयों में उनका सम्मान ही अंतिम होना चाहिए। दूसरी ओर सोशल मीडिया पर यह भी तर्क दिया गया कि तेज प्रताप की हर हरकत से भाजपा को बैठे-बिठाए मुद्दा मिलता है और चुनावी नैरेटिव भटक जाता है।

इसके उलट तेजस्वी यादव की चुप्पी को उनके समर्थक एक बड़ी राजनीतिक ताकत मानते हैं। कुछ का कहना है कि आलोचना, आरोप और पारिवारिक उलझनों के बावजूद तेजस्वी ने संयमित रवैया बनाए रखा है। गोदी मीडिया के सर्वे भी, कई यूज़र्स के अनुसार, उन्हें बिहार का सबसे लोकप्रिय नेता मानते हैं—बिल्कुल वैसे ही जैसे यूपी में अखिलेश यादव को। समर्थकों का कहना है कि बेईमानी से प्रभावित चुनाव परिणाम को आधार बनाकर तेजस्वी को विफल बताना गलत है, क्योंकि नेतृत्व साख का असली पैमाना दीर्घकालिक जनसमर्थन होता है।

वहीं दूसरी ओर तेजस्वी के खिलाफ भी आवाज़ें उठ रही हैं। कई कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि टिकट बंटवारा पूरी तरह गलत तरीके से किया गया, नियंत्रण जयचंद-संजय जैसे बाहरी हस्तक्षेपों में रहा, और कई सीटें इसी वजह से हाथ से निकल गईं। परिहार जैसी सीटों का उदाहरण दिया जा रहा है, जहाँ लोकल समीकरणों की अवहेलना पार्टी को भारी पड़ी। कुछ कार्यकर्ताओं ने यहाँ तक कहा कि इन परिवारवाद-निर्भर चेहरों की वजह से ही राजद पर बार-बार वंशवाद का ठप्पा लग जाता है।

हालाँकि युवाओं और कोर समर्थकों का एक बड़ा तबका अब भी तेजस्वी यादव को भविष्य का चेहरा मानता है। उनका कहना है कि दो सीटों से दो सौ सीटों तक की यात्रा संभव साबित हुई है, तो सत्ता वापसी भी असंभव नहीं। वे तेजस्वी के नेतृत्व पर विश्वास जताते हुए कहते हैं कि जिस दिन वे मुख्यमंत्री बनेंगे, वे बिहार के सर्वश्रेष्ठ और सबसे आधुनिक सोच वाले मुख्यमंत्री साबित होंगे।

कुल मिलाकर बिहार की राजनीति इस समय उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है—परिवार के भीतर मतभेद, चुनावी रणनीति पर असहमति, टिकट वितरण पर नाराज़गी और हार की स्थिति में उठा सवाल… सब एक साथ सतह पर आ गए हैं। लेकिन इन्हीं बहसों के बीच एक बात साफ़ दिखाई देती है—तेजस्वी यादव की लोकप्रियता और राजनीतिक भविष्य पर समर्थकों का भरोसा अब भी अखंड है, और इसी वजह से बिहार की राजनीति की दिशा इन्हीं घटनाओं के आधार पर आने वाले महीनों में काफी बदल सकती है।

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