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कांग्रेस को कोसते प्रधानमंत्री और 1946 की चेतावनी — राजेंद्र माथुर का पुराना लेख आज फिर सच साबित हो रहा है

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बिहार चुनाव 2025 के परिणामों के बाद प्रधानमंत्री जिस तीव्रता से कांग्रेस पर हमले कर रहे हैं, वह किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का स्वाभाविक परिणाम नहीं है—यह डर की प्रतिक्रिया है। डर इस बात का कि देश में पहली बार इतना बड़ा, खुला और संस्थागत स्तर पर किया गया चुनावी ध्वंस अब जनता के बीच चर्चा का विषय बन चुका है। डर इस बात का कि लोकतंत्र, जिसे वोट चोरी, डेटा मैनिपुलेशन और सत्ता-प्रेरित संरचनाओं के दबाव से बुरी तरह घायल किया गया है, उसे अब फिर से जीवित और सुरक्षित करने की क्षमता केवल कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय, समावेशी और लोकतांत्रिक परंपरा वाली शक्ति में है। प्रधानमंत्री जानते हैं कि इस “चुनावी डकैती” के बाद देश में जो राजनीतिक संतुलन बिगड़ा है, उसकी भरपाई और लोकतांत्रिक ढांचे की पुनर्स्थापना तभी संभव है जब कांग्रेस दोबारा उभरे—और यही वजह है कि आज सबसे तेज वार उसी पर किए जा रहे हैं।

राजेंद्र माथुर का पुराना लेख: कांग्रेस का ध्वंस हमें 1946 में लौटा देगा

आज जबकि लोकतंत्र की सांसें धीमी की जा रही हैं, प्रख्यात संपादक राजेंद्र माथुर का वह पुराना ऐतिहासिक लेख एक बार फिर प्रासंगिक हो उठा है। माथुर ने दशकों पहले चेतावनी दी थी कि कांग्रेस के ध्वंस का अर्थ केवल एक राजनीतिक दल का पराजय नहीं होगा, बल्कि भारत को उन अंधेरे दिनों की ओर वापस धकेल देना होगा जिनकी शुरुआत 1946 के सांप्रदायिक उन्माद, नफरत और विघटन से हुई थी। उनका यह कहना कोई पक्षपात नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास और समाज की गहरी समझ का निष्कर्ष था। जो राजनीतिक शक्तियाँ आज स्वयं को राष्ट्रवादी बताकर सत्ता के मद में विभाजन को बढ़ावा दे रही हैं, वे वही प्रवृत्तियाँ हैं जिन्हें कांग्रेस ने दशकों तक रोका, संभाला और लोकतंत्र की जमीन को चरमपंथ से सुरक्षित रखा।

लोकतंत्र पर सबसे बड़ा आघात: चुनाव चुराकर सत्ता हथियाने की संस्कृति

बिहार 2025 ने दिखा दिया कि लोकतंत्र के खिलाफ सबसे खतरनाक हथियार बंदूकें, हिंसा या उग्रवाद नहीं—बल्कि डेटा-प्रेरित हाई-टेक धांधली है। 128 सीटों पर जीत का अंतर डिलीटेड वोटर्स की संख्या से कम था। कई जगह जीत 100, 200 और 500 वोटों पर टिकी, जबकि वोटरों की सूची से 20–60 हजार नाम हटाए गए। यह कोई साधारण गलती नहीं—यह संगठित प्रयास था जो सत्ता को विपक्ष की पहुँच से दूर रखने के लिए किया गया। प्रधानमंत्री का लगातार कांग्रेस पर हमला इसलिए है ताकि जनमानस का ध्यान इस सबसे बड़े चुनावी अपराध से हटाया जा सके। उन्हें बखूबी पता है कि ऐसी धांधली से जन्मी सरकार, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं पर पड़े अविश्वास को खत्म कर सकने वाली ताकत अगर किसी में है, तो वह कांग्रेस जैसी अनुभवी और सम्मिलित राजनीति वाली संस्था में है।

कांग्रेस की वही ऐतिहासिक भूमिका—लोक को जोड़ना, लोकतंत्र को बचाना

आज की स्थिति में सबसे त्रासदीपूर्ण तथ्य यह है कि जिन शक्तियों ने वोट चोरी, संस्थागत कब्ज़ा और लोकतांत्रिक संरचनाओं का अवमूल्यन किया है, वही स्वयं को देश का रक्षक और विपक्ष को राष्ट्र-विरोधी बताने में लगे हैं। और यही वह क्षण है जहाँ राजेंद्र माथुर का लेख सबसे ज्यादा चमकता है—उन्होंने कहा था कि कांग्रेस की कमजोरी देश की कमजोरी बनती है, क्योंकि उसके बावजूद उसमें जोड़ने की क्षमता है; वह समाज के विविधता वाले ढांचे को बचाने वाली सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है। कांग्रेस ने अपने दोषों और गलतियों के बावजूद भारत के लोकतंत्र, समावेशिता और संवैधानिक मूल्यों को कभी खतरे में नहीं डाला। इसके विपरीत प्रतिगामी शक्तियाँ लोकतंत्र को बोझ मानती हैं और सत्ता को अधिकार।

क्यों प्रधानमंत्री को कांग्रेस सबसे बड़ा खतरा लग रही है?

क्योंकि कांग्रेस वह आखिरी राष्ट्रीय शक्ति है जो—

  • नफरत की राजनीति को चुनौती देती है
  • लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा की आवाज उठाती है
  • चुनावी धांधली को उजागर करती है
  • जनता को सत्ता के दुरुपयोग से बचाने की परंपरा रखती है
  • और सबसे महत्वपूर्ण—एक वैकल्पिक विचार प्रस्तुत करती है जिसमें देश विभाजित नहीं, बल्कि एकजुट रहता है।

प्रधानमंत्री की चिंता यह नहीं कि कांग्रेस कमजोर है—बल्कि यह है कि कांग्रेस दोबारा मजबूत हो सकती है। यह पहला चुनाव था जिसमें जनता ने साफ देखा कि अगर भारत को लोकतंत्र की बर्बादी से बचाना है, तो प्रतिगामी शक्तियों के मुकाबले एकमात्र विकल्प कांग्रेस ही है।

1946 की चेतावनी आज 2025 में खड़ी है

राजेंद्र माथुर ने कहा था — “कांग्रेस का ध्वंस हमें 1946 में लौटा देगा।” आज यह वाक्य सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष वास्तविकता की तरह सामने खड़ा है। बिहार चुनाव का परिणाम उसी दिशा में पहला कदम है। और यही कारण है कि आज कांग्रेस को कोसने, बदनाम करने और कमजोर दिखाने की कोशिशें अपने चरम पर हैं। क्योंकि लोकतंत्र के इस अंधकार में—कांग्रेस ही वह अंतिम दीपक है जिससे रोशनी वापस आ सकती है।

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