ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 30 मार्च 2026
लेखक पी.ए. कृष्णन ने अपने लेख में एक अहम और सीधी बात रखी है—आज जो ‘नेहरू बनाम पटेल’ की बहस तेज की जा रही है, वह पूरी तरह सच्चाई पर आधारित नहीं है, बल्कि इसे एक खास सोच के तहत गढ़ा गया है। उनका मानना है कि इस बहस का इस्तेमाल समाज को बांटने और इतिहास को अपने हिसाब से पेश करने के लिए किया जा रहा है।लेख में बताया गया है कि आजादी के समय जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल दोनों ही देश के बड़े और प्रभावशाली नेता थे। दोनों ने मिलकर देश को मजबूत करने, संस्थाओं को खड़ा करने और एकजुट भारत बनाने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन आज कुछ लोग यह तस्वीर बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि दोनों के बीच गहरा टकराव था, जबकि सच्चाई इससे काफी अलग है।
पी.ए. कृष्णन साफ कहते हैं कि यह दावा करना कि नेहरू ने पटेल का हक छीनकर प्रधानमंत्री पद हासिल किया, सही नहीं है। उस समय फैसले किसी एक व्यक्ति के दम पर नहीं, बल्कि सामूहिक सहमति और पार्टी की प्रक्रिया के तहत लिए जाते थे। इसे किसी साजिश या व्यक्तिगत चाल के रूप में दिखाना इतिहास को गलत तरीके से पेश करना है।
लेख यह भी स्पष्ट करता है कि नेहरू और पटेल की सोच में कुछ मुद्दों पर अंतर जरूर था, लेकिन उनके लक्ष्य में कोई फर्क नहीं था। दोनों ही एक मजबूत, एकजुट और आगे बढ़ते भारत का सपना देखते थे। आज जिस तरह उनके रिश्ते को टकराव के रूप में दिखाया जा रहा है, वह उनके असली योगदान को कम करके दिखाने जैसा है।
कृष्णन के मुताबिक, इस तरह की बहस को बढ़ावा देने वाले वे लोग हैं जो आज की राजनीति में अपनी जगह मजबूत करने के लिए अतीत को नए ढंग से गढ़ना चाहते हैं। क्योंकि वे उन नेताओं की व्यापक और सबको साथ लेकर चलने वाली सोच का मुकाबला नहीं कर पाते, जिन्होंने वास्तव में देश की नींव रखी।
इस पूरे लेख का सीधा संदेश यही है कि इतिहास को समझते समय हमें भावनाओं, अफवाहों या प्रचार से नहीं, बल्कि तथ्यों और सच्चाई से काम लेना चाहिए। जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल दोनों ही भारत निर्माण के मजबूत स्तंभ थे, और उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना न तो सही है और न ही देश के हित में।




