नई दिल्ली, 15 नवंबर 2025
भारत में पारदर्शिता और जनभागीदारी की रीढ़ माने जाने वाले सूचना के अधिकार—RTI—को आखिरकार वही हुआ जिसका भय पिछले कई वर्षों से जताया जा रहा था। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDPA) के लागू होते ही RTI की आत्मा को निर्वस्त्र कर दिया गया है। यह संशोधन केवल तकनीकी या कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर सीधा आघात है। यह वह क्षण है जिसकी ओर बढ़ने में केंद्र सरकार ने 20 साल लगाए—RTI को निष्प्राण करने और जनता की निगरानी की शक्ति को खत्म करने के लिए। यह वह हमला है जिसमें सत्ता एक साथ दो चीजें हासिल करती है: पारदर्शिता का खात्मा और जवाबदेही से मुक्ति।
RTI की हत्या किसी एक कानून का संशोधन नहीं—यह नागरिक शक्ति के अंत का उद्घोष है
RTI भारत में लोकतंत्र का सबसे शक्तिशाली उपकरण था। यह वह कानून था जिससे साधारण नागरिक प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर ग्राम पंचायत तक हर स्तर की जानकारी मांग सकता था। RTI ने नौकरशाही की चुप्पी को तोड़ा, भ्रष्टाचार को उजागर किया, गलत नियुक्तियों को चुनौती दी, घोटालों को उजागर किया और सत्ता को डर का अनुभव कराया। 20 वर्षों में लाखों नागरिकों ने इसका इस्तेमाल कर प्रशासन को जवाबदेह बनाया। लेकिन DPDPA ने “पर्सनल इंफॉर्मेशन” की नाम पर ऐसी दीवार खड़ी कर दी है कि अब नागरिक संस्था, अधिकारी, प्रतिनिधि, ठेकेदार—किसी के भी कामकाज की जानकारी प्राप्त नहीं कर सकेंगे। सरकार ने अपने ऊपर लगे निगरानी कैमरे को कानून के नाम पर बंद कर दिया है।
यह संशोधन केवल गोपनीयता की ढाल नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार संरक्षण कानून है। अब RTI का उपयोग कर अधिकारी की जिम्मेदारी, फाइल नोटिंग, कार्रवाई का कारण, निर्णय प्रक्रिया—सबकुछ जानना लगभग असंभव हो जाएगा। ऊपर से Section 43A जैसे संशोधन, RTI की आत्मा को मिटाकर उसे केवल एक नाम भर का कानून बना देते हैं। यह RTI की हत्या है, जिसे कागज पर “संशोधन” कहा जा रहा है।
DPDPA: एक ऐसा काला कानून जो भ्रष्ट को बचाए और जनता को अंधा करे
DPDPA का असली उद्देश्य स्पष्ट है—“जो भी गलत कर रहे हैं, उनकी पहचान और जिम्मेदारी को छिपाना।” अब कोई नागरिक यह नहीं पूछ सकता कि किस अधिकारी ने किस अनुमति पर साइन किया, किस नेता ने कौन सा आदेश दिया, किस फाइल को रोककर रखा गया, किस खर्च को मंजूरी दी गई, किस ठेकेदार को फायदा पहुंचाया गया—क्योंकि सरकार ने इन सभी को “पर्सनल डेटा” कहकर जनता की पहुँच से बाहर कर दिया है। सत्ता ने पहली बार खुद को कॉर्पोरेट्स और अधिकारियों की तरह एक “संरक्षित इकाई” घोषित कर दिया है। यह व्यवस्था न लोकतंत्र की है, न जनता की—यह पूरी तरह सत्ता-मशीनरी की सुरक्षा के लिए बनाया गया एक कवच है। सबसे खतरनाक तथ्य यह है कि अब आधिकारिक गलती, रिश्वत, सौदेबाजी, भ्रष्टाचार, फर्जीवाड़े—इन सबकी जानकारी RTI के माध्यम से सामने लाना लगभग असंभव हो जाएगा। यह लोकतंत्र के खिलाफ सीधा प्रहार है, जहाँ जनता को अंधा और सत्ता को असीमित शक्ति दी जाती है।
RTI को खत्म करने का लक्ष्य—जवाबदेही खत्म करना और सत्ता को जनता से ऊपर रखना
RTI ही वह कानून था जिसने ‘अधिकारी’ और ‘नागरिक’ के बीच की दूरी को कम किया। इससे जनता को पहली बार लगा कि वह सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि सत्ता का मालिक है। RTI ने सत्ता की पारदर्शिता को बाध्य किया—और सत्ता को यह सबसे कम पसंद था। इसीलिए आज, जब DPDPA ने RTI को लगभग निष्क्रिय बना दिया है, सत्ता में बैठे लोग खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। अब घोटालों का खुलासा, अनुचित कार्यवाही, गलत नियुक्तियाँ, फाइलों की लेटिंग, अवैध आदेश—सबकुछ जनता की निगाह से पूरी तरह छिपाया जा सकेगा। यह केवल कानून का बदलना नहीं, सत्ता और जनता के संबंध का पुनःनिर्माण है—जहाँ जनता अब प्रश्न पूछने का अधिकार खो चुकी है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती—“We The People” की लड़ाई अब शुरू होती है
RTI मरने दी गई है, लेकिन उसके कारण उत्पन्न चेतना जीवित है। Aruna Roy और Nikhil Dey जैसे कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट कहा है कि RTI कोई कानून नहीं बल्कि आंदोलन है। सरकार कानून को कमजोर कर सकती है, पर आंदोलन को नहीं मिटा सकती। आज पूरे देश में यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत अब वैसा लोकतंत्र रह भी गया है जहाँ जनता सत्ता से जवाब मांग सके?
इस प्रश्न का उत्तर वही देगा—जो इस देश को लोकतांत्रिक मूल्यों पर विश्वास है और जिनके भीतर सत्य की लौ बुझने नहीं दी जा सकती। और यही कारण है कि RTI की हत्या के बाद “We the People” फिर उठ खड़े होंगे। यही संघर्ष अब आगे का इतिहास लिखेगा—जहाँ सत्ता यह नहीं तय करेगी कि जनता कितना जानेगी, बल्कि जनता यह तय करेगी कि सत्ता कितनी छिपा सकती है। RTI शायद आज मर चुकी है, लेकिन जनता का अधिकार अभी भी जीवित है—और वह वापस अपना लोकतंत्र लेने आएगी।




