ओपिनियन / पर्यावरण | बिमला कुमारी, अध्यक्ष, भारतीय योगिनी संघ | आद्या कौशलम् ट्रस्ट, नई दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 जून 2026
योग: केवल स्वास्थ्य नहीं, पर्यावरण चेतना का भी आधार
आज मानव सभ्यता जिस पर्यावरणीय संकट के दौर से गुजर रही है, उसके मूल में प्रकृति से बढ़ती दूरी, उपभोगवादी जीवनशैली और भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी प्रतिस्पर्धा है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जल संकट और जैव विविधता के क्षरण जैसी चुनौतियाँ मानव अस्तित्व के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर रही हैं। ऐसे समय में योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का एक प्रभावी और स्थायी माध्यम भी बन सकता है। योग मनुष्य को प्रकृति के साथ संतुलित संबंध स्थापित करने की प्रेरणा देता है और उसे अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाता है।
योग का मूल संदेश: प्रकृति से एकात्मता
योग और पर्यावरण का संबंध अत्यंत गहरा और अभिन्न है। योग हमें यह सिखाता है कि हम स्वयं को प्रकृति से पृथक न समझें, बल्कि उसके अविभाज्य अंग के रूप में देखें। जब व्यक्ति योग और प्राणायाम का नियमित अभ्यास करता है, तब उसका मन शांत, निर्मल और एकाग्र होता है। मन की यह शुद्धता विचारों में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का भाव उत्पन्न करती है। महर्षि पतंजलि का प्रथम सूत्र — “अथ योगानुशासनम्” — योग के अनुशासन और जीवन-व्यवस्था की ओर संकेत करता है। यही अनुशासन व्यक्ति को प्रकृति, समाज और समस्त सृष्टि के प्रति उत्तरदायी बनाता है।
प्राणायाम से जागती है पर्यावरणीय संवेदना
प्राणायाम केवल श्वास की प्रक्रिया नहीं, बल्कि चेतना के परिष्कार का माध्यम है। जब व्यक्ति अपनी श्वास के माध्यम से स्वयं को प्रकृति से जोड़ता है, तब उसके भीतर पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता स्वतः विकसित होती है। वह वृक्षों, नदियों, पर्वतों और प्राकृतिक संसाधनों को केवल उपयोग की वस्तु नहीं बल्कि जीवनदाता के रूप में देखने लगता है। परिणामस्वरूप जल संरक्षण, वृक्षारोपण, स्वच्छता और प्रदूषण नियंत्रण जैसे कार्य उसके लिए सामाजिक अभियान नहीं बल्कि व्यक्तिगत दायित्व बन जाते हैं।
भारतीय दर्शन में प्रकृति का दिव्य स्वरूप
भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा में प्रकृति को सदैव पूजनीय माना गया है। ईशावास्य उपनिषद् का उद्घोष — “ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्” — हमें यह बोध कराता है कि संपूर्ण सृष्टि में ईश्वर का वास है। जब मनुष्य वृक्षों, नदियों, पशु-पक्षियों और प्राकृतिक तत्वों में भी परमात्मा का दर्शन करता है, तब उनके संरक्षण का भाव स्वतः उत्पन्न होता है। यही योग का भी वास्तविक संदेश है—समस्त सृष्टि के साथ एकत्व का अनुभव।
वेदों और उपनिषदों का पर्यावरण दर्शन
ऋग्वेद, यजुर्वेद, उपनिषद और पुराण प्रकृति के महत्व को बार-बार रेखांकित करते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा में पृथ्वी को माता, जल को जीवन, वायु को प्राण और अग्नि को ऊर्जा का स्रोत माना गया है। यह दृष्टिकोण केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन का वैज्ञानिक आधार भी है। प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन ही मानव कल्याण का मार्ग है। योग इसी संतुलन को पुनर्स्थापित करने का माध्यम बनता है।
सांख्य दर्शन और प्रकृति का महत्व
सांख्य दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि का विकास प्रकृति और पुरुष के सिद्धांतों पर आधारित है। यह दर्शन स्पष्ट करता है कि प्रकृति केवल बाहरी वातावरण नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व की आधारशिला है। यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी तो मानव जीवन सुरक्षित रहेगा। योग इस सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव कराता है और मनुष्य में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव विकसित करता है।
वृक्षों की पूजा: संरक्षण की सांस्कृतिक परंपरा
भारतीय समाज में पीपल, बरगद, तुलसी और अन्य वृक्षों की पूजा केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दूरदर्शी व्यवस्था रही है। भगवद्गीता में अश्वत्थ वृक्ष का विशेष महत्व बताया गया है, जबकि वट सावित्री व्रत में बरगद की पूजा की जाती है। इन परंपराओं के पीछे उद्देश्य था कि समाज वृक्षों को केवल संसाधन न माने बल्कि जीवनदाता के रूप में सम्मान दे। हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण संरक्षण को संस्कृति और आस्था से जोड़कर उसे जन-जन तक पहुँचाया।
केवल वृक्षारोपण नहीं, संरक्षण भी आवश्यक
आज पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल नए पौधे लगाना नहीं, बल्कि पहले से मौजूद वृक्षों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना भी है। बढ़ते शहरीकरण, औद्योगीकरण और अनियंत्रित उपभोग ने पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। तापमान में वृद्धि, जल संकट, प्रदूषण और अनियमित वर्षा इसके प्रत्यक्ष परिणाम हैं। यदि हम योग के सिद्धांतों—अहिंसा, अपरिग्रह, संतोष, संयम और प्रकृति के प्रति सम्मान—को जीवन में उतारें, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा परिवर्तन संभव है।
योग: आत्मानुशासन से सामाजिक परिवर्तन तक
योग व्यक्ति को केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं बनाता, बल्कि उसके विचारों और व्यवहार का भी परिष्कार करता है। योग के माध्यम से विकसित आत्मानुशासन व्यक्ति को संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग, प्रकृति के प्रति सम्मान और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना सिखाता है। वह समझता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों या संस्थाओं का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है।
योगमय जीवन ही पर्यावरणीय समाधान
योग और पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। योग मनुष्य को प्रकृति के प्रति प्रेम, सम्मान और संरक्षण का संस्कार देता है, जबकि स्वस्थ पर्यावरण योगमय और संतुलित जीवन के लिए आधार प्रदान करता है। आज आवश्यकता है कि हम योग और प्राणायाम को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं तथा वृक्षारोपण, जल संरक्षण, स्वच्छता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को जनआंदोलन का रूप दें। योग से जागृत पर्यावरण चेतना ही आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ, सुरक्षित और संतुलित पृथ्वी दे सकती है। यही मानवता, प्रकृति और भविष्य के प्रति हमारी सच्ची जिम्मेदारी है।




