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ग्रेट निकोबार परियोजना पर बड़ा खुलासा: वित्त मंत्रालय ने पहले उठाए थे सवाल, बाद में मिला ‘रणनीतिक परियोजना’ का दर्जा

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 जून 2026

देश की सबसे बड़ी और महत्वाकांक्षी विकास परियोजनाओं में शामिल ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर एक महत्वपूर्ण खुलासा सामने आया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वित्त मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाले पब्लिक इन्वेस्टमेंट बोर्ड (PIB) ने वर्ष 2024 में इस परियोजना के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक, गैलेथिया बे में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (ICTP) को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे। उस समय बोर्ड का मानना था कि परियोजना के दस्तावेजों में इसके रणनीतिक महत्व को पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है। हालांकि लगभग डेढ़ वर्ष बाद यही परियोजना रक्षा मंत्रालय द्वारा आधिकारिक रूप से “रणनीतिक परियोजना” घोषित कर दी गई। इस खुलासे ने परियोजना को लेकर नई बहस छेड़ दी है और कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर ऐसा क्या बदला कि जिस परियोजना के रणनीतिक उद्देश्य पहले स्पष्ट नहीं माने गए, वही बाद में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी परियोजना बन गई।

ग्रेट निकोबार परियोजना को भारत की भविष्य की समुद्री और आर्थिक रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। लगभग 81,000 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना में एक विशाल अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, आधुनिक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, बिजली उत्पादन केंद्र तथा एक नए शहर के निर्माण की योजना शामिल है। सरकार का मानना है कि यह परियोजना भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार के क्षेत्र में नई पहचान दिला सकती है। वर्तमान में एशिया के कई बड़े ट्रांसशिपमेंट हब जैसे सिंगापुर और कोलंबो अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत लंबे समय से इस क्षेत्र में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और ग्रेट निकोबार परियोजना को इसी दिशा में एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है।

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वित्त मंत्रालय की समिति द्वारा अगस्त 2024 में की गई समीक्षा बैठक के दस्तावेजों के अनुसार उस समय समिति ने परियोजना के आर्थिक और व्यापारिक लाभों को तो स्वीकार किया था, लेकिन यह महसूस किया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक हितों से जुड़े पहलुओं को पर्याप्त रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया है। समिति ने संबंधित मंत्रालय को सुझाव दिया था कि परियोजना प्रस्ताव में रणनीतिक उद्देश्यों और सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि बाद में केंद्र सरकार ने इसी रणनीतिक महत्व का हवाला देते हुए परियोजना से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण रिपोर्टों को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया।

दरअसल, ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन करने वाली एक उच्च स्तरीय समिति (HPC) की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग लंबे समय से उठती रही है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और कई विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर होने वाला निर्माण कार्य द्वीप की संवेदनशील पारिस्थितिकी पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। लेकिन सरकार ने इस रिपोर्ट की पूरी जानकारी सार्वजनिक करने से इनकार करते हुए कहा कि परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जुड़ी हुई है। अब जब यह जानकारी सामने आई है कि कभी इसी परियोजना के रणनीतिक उद्देश्य पर सवाल उठाए गए थे, तो पारदर्शिता को लेकर बहस और तेज हो गई है।

ग्रेट निकोबार द्वीप जैव विविधता की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। यहां दुर्लभ वनस्पतियां, समुद्री जीव, कछुओं के प्रजनन क्षेत्र और कई संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र मौजूद हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई, बंदरगाह निर्माण और शहरी विकास गतिविधियों से इन प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंच सकता है। उनका तर्क है कि विकास आवश्यक है, लेकिन विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन भी उतना ही जरूरी है। कई वैज्ञानिकों और पर्यावरण संगठनों ने मांग की है कि परियोजना से जुड़े सभी अध्ययन और रिपोर्ट सार्वजनिक किए जाएं ताकि आम जनता और विशेषज्ञ स्वतंत्र रूप से उनका मूल्यांकन कर सकें।

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दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में ग्रेट निकोबार का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय रणनीतिक चुनौतियों को देखते हुए भारत को ऐसे बुनियादी ढांचे की आवश्यकता है जो आर्थिक और सामरिक दोनों दृष्टियों से देश को मजबूत बना सके। सरकार का मानना है कि ग्रेट निकोबार परियोजना केवल एक बंदरगाह या विकास परियोजना नहीं है, बल्कि यह भारत की दीर्घकालिक समुद्री रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

विपक्षी दलों और कई विशेषज्ञों ने इस पूरे मामले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि वित्त मंत्रालय की समिति को 2024 में परियोजना के रणनीतिक महत्व पर संदेह था, तो बाद में इसे रणनीतिक परियोजना घोषित करने के पीछे के कारणों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

ग्रेट निकोबार परियोजना अब केवल विकास परियोजना नहीं रह गई है, बल्कि यह विकास, पर्यावरण, पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन की एक बड़ी बहस का केंद्र बन चुकी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस परियोजना को आगे बढ़ाते हुए पर्यावरणीय चिंताओं और पारदर्शिता की मांगों का किस प्रकार समाधान करती है। फिलहाल वित्त मंत्रालय की पुरानी टिप्पणियों के सामने आने से इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर नए सवाल और नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

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