ओपिनियन/ व्यापार | प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | 15 मई 2026
हाईवे, भारी कर्ज और घटती बचत : भारत के लिए खतरे की घंटी
खाड़ी देशों में पैदा हुआ तनाव भारत की आर्थिक परेशानियों की असली वजह नहीं है। उसने सिर्फ उन कमजोरियों को सामने ला दिया है जो कई वर्षों से धीरे-धीरे बढ़ रही थीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोना कम खरीदने, पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने, खाने के तेल के आयात में सावधानी बरतने और यहां तक कि घरेलू व विदेशी यात्राओं को सीमित करने जैसी अपीलें केवल सामान्य सलाह नहीं हैं। ये संकेत हैं कि देश की अर्थव्यवस्था दबाव में है और सरकार को आने वाले समय की चिंता दिखाई दे रही है। भारत की आर्थिक मुश्किलें केवल कोरोना महामारी के कारण पैदा नहीं हुईं। असली समस्या उससे कहीं पुरानी है। कई वर्षों से अर्थव्यवस्था की बुनियादी कमजोरियों को नजरअंदाज किया गया। गलत नीतियों, अधूरे सुधारों और बढ़ते कर्ज ने हालात को और जटिल बना दिया। आज वर्क फ्रॉम होम जैसी चीजों को भी राहत के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे छिपे खर्च और दूरसंचार व्यवस्था पर बढ़ते दबाव की चर्चा कम होती है। सरकारी आंकड़ों में विकास की चमक दिखाई जाती है, लेकिन जमीन पर आम आदमी की जिंदगी उस तस्वीर से काफी अलग नजर आती है। अब स्थिति यह हो गई है कि खुद नीति आयोग भी बड़े-बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स को संसाधनों पर बोझ मानने लगा है। दूसरी तरफ रिजर्व बैंक द्वारा लगातार सोना खरीदने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। इसका मकसद डॉलर पर निर्भरता कम करना बताया गया, लेकिन इसका असर आम लोगों की बचत और बाजार दोनों पर पड़ा।
सबसे बड़ी चिंता यह नहीं कि भारत की अर्थव्यवस्था तुरंत गिरने वाली है, बल्कि यह है कि उसकी बुनियाद उतनी मजबूत नहीं दिख रही जितनी सरकारी दावों में बताई जाती है। 2026 में पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स की एक रिपोर्ट में कहा गया कि 2012 से 2023 के बीच भारत की जीडीपी ग्रोथ को वास्तविकता से ज्यादा दिखाया गया हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार जहां आधिकारिक विकास दर करीब 6 प्रतिशत बताई गई, वहीं असली वृद्धि शायद 4 से 4.5 प्रतिशत के आसपास रही। अगर यह आकलन सही है, तो इसका मतलब है कि देश की वास्तविक आय और लोगों का जीवन स्तर सरकारी दावों से काफी कमजोर है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF ने भी 2024 में असामान्य तरीके से भारत की ऊंची विकास दर के दावों से दूरी बनाई थी। IMF की प्रवक्ता जूली कोजैक ने साफ कहा था कि भारत के लिए 8 प्रतिशत विकास दर का अनुमान IMF का आधिकारिक मत नहीं है और संस्था अब भी 6.5 प्रतिशत की वृद्धि दर मानती है। यह बयान अपने आप में बहुत बड़ा संकेत था कि दुनिया भी भारत के आर्थिक दावों को लेकर सवाल पूछ रही है।
महंगाई को आज खाड़ी संकट से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन पूरी सच्चाई इससे कहीं बड़ी है। 2015 के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें काफी नीचे चली गई थीं। कई बार तेल 40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। इसके बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल सस्ता नहीं हुआ। सरकार ने अलग-अलग टैक्स और सेस लगाकर कीमतों को ऊंचा बनाए रखा। वजह यह बताई गई कि यूपीए सरकार के समय के पेट्रोलियम बॉन्ड का बोझ चुकाना है। लेकिन जहां करीब 3 लाख करोड़ रुपये का बोझ था, वहीं सरकार ने अतिरिक्त टैक्स से लगभग 39 लाख करोड़ रुपये वसूल लिए। इसका असर सीधा आम आदमी की जेब पर पड़ा। परिवहन महंगा हुआ, सामान महंगा हुआ और लोगों की खरीदने की ताकत कमजोर होती चली गई।
हाईवे टोल की लगातार बढ़ती दरें और नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी NHAI का बढ़ता कर्ज भी चिंता का बड़ा कारण है। सड़कें बनीं, एक्सप्रेसवे बने, लेकिन उनके बदले देश पर भारी आर्थिक बोझ भी बढ़ता गया। विकास के नाम पर लिए गए बड़े-बड़े कर्ज अब अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहे हैं।
“मेक इन इंडिया” जैसे अभियानों के बावजूद मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर मजबूत नहीं हो पाया। 2013-14 में जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 16.7 प्रतिशत थी, जो 2023-24 में घटकर 15.9 प्रतिशत रह गई। यानी देश में उद्योग बढ़ने के बजाय कमजोर हुए। रोजगार भी उम्मीद के मुताबिक पैदा नहीं हुए और आयात पर निर्भरता बनी रही।
रुपये की कृत्रिम मजबूती ने निर्यात को भी नुकसान पहुंचाया। छोटे और मध्यम उद्योग विदेशी बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाए, जबकि सस्ते आयात ने घरेलू बाजार को प्रभावित किया। दूसरी तरफ सबसे चिंताजनक स्थिति घरेलू बचत की है। लोगों की बचत तेजी से घटी है। परिवार अब अपनी जमा पूंजी खर्च कर रहे हैं और जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज लेने को मजबूर हो रहे हैं। यह किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरे का संकेत होता है।
सरकारी कंपनियों की हालत भी दबाव में है। इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल जैसी तेल कंपनियों को मार्च 2026 के बाद कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण भारी नुकसान हुआ। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर भी दबाव बढ़ रहा है क्योंकि सरकारी बॉन्ड की कीमतें गिरने से उनकी बैलेंस शीट प्रभावित हो रही है। ऊपर से लंबे समय से चली आ रही समस्याएं — जैसे कम दक्षता, पुरानी तकनीक और भारी कर्ज — हालात को और मुश्किल बना रहे हैं।
बैंकिंग व्यवस्था में भी खतरे बढ़ रहे हैं। कोरोना के बाद अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए बैंकों ने बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर और निर्माण परियोजनाओं को कर्ज दिया। लाखों करोड़ रुपये के लोन बांटे गए। लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि क्या इन परियोजनाओं से उतनी आय और रोजगार पैदा हुए, जितनी उम्मीद की गई थी? अगर नहीं, तो आने वाले वर्षों में यही कर्ज नई समस्या बन सकते हैं।
भारत की राजनीति में पुरानी सरकारों को दोष देना आम बात है। लेकिन असली सवाल यह है कि वर्तमान सरकार ने सुधार के लिए क्या किया। मनमोहन सिंह सरकार पर बड़े उद्योगपतियों को आसान कर्ज देने और बैंकों को एनपीए के संकट में डालने के आरोप लगे। लेकिन मोदी सरकार पर भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या उसने जरूरत से ज्यादा बड़े निर्माण और सड़क परियोजनाओं पर बैंकिंग सिस्टम का पैसा झोंक दिया।
नोटबंदी ने देश की नकद आधारित अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाई। छोटे व्यापारी, मजदूर और ग्रामीण बाजार सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने से बैंकिंग सिस्टम पर अतिरिक्त खर्च बढ़ा और कई विरोधाभास भी सामने आए।
अब भारत के सामने सबसे बड़ी जरूरत है नई आर्थिक सोच की। केवल बड़े प्रोजेक्ट्स, ऊंचे दावे और चमकदार आंकड़े किसी देश को मजबूत नहीं बनाते। मजबूत अर्थव्यवस्था वही होती है जहां लोगों की बचत सुरक्षित हो, रोजगार बढ़ें, उद्योग मजबूत हों और आम आदमी की जेब पर बोझ कम हो। भारत को अब ऐसी नीतियों की जरूरत है जो केवल विकास का प्रचार न करें, बल्कि वास्तव में आत्मनिर्भर और टिकाऊ आर्थिक व्यवस्था तैयार करें।




