एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 10 फरवरी 2026
एक डरी हुई और असहज सरकार आखिर कर भी क्या सकती है? जब सवालों के जवाब न हों, जब सच्चाई सामने आने का खतरा हो, तो सत्ता का सबसे पुराना हथियार इस्तेमाल किया जाता है—डर, दमन और मुकदमे। यही तस्वीर उस वक्त सामने आई जब पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे की कथित अनपब्लिश्ड किताब के कथित सर्कुलेशन को लेकर एफआईआर दर्ज कर दी गई। यह एफआईआर किसी राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि उस सच्चाई से बचने की कोशिश है, जो संसद के भीतर उठाई गई थी।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी संसद में उस किताब की प्रति लेकर पहुंचे थे और उन्होंने दावा किया था कि चीन ने लद्दाख में घुसपैठ की थी—एक ऐसा दावा, जिसे सरकार बार-बार नकारती रही है। लेकिन सवाल यह नहीं है कि किताब छपी या नहीं, सवाल यह है कि अगर उसमें लिखी बातें झूठ हैं तो सरकार बहस से क्यों भाग रही है? अगर किताब में कुछ गलत है तो तथ्यों से खंडन क्यों नहीं किया गया? जवाब की जगह FIR ने ले ली है।
किताब छपी या नहीं—यही मुद्दा बना कर सच से ध्यान हटाने की कोशिश
पूरे मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि सरकार और उसके समर्थक अब इस बहस में उलझे हुए हैं कि किताब छपी थी या नहीं, किताब पब्लिश हुई या नहीं, और अगर नहीं हुई तो वह राहुल गांधी तक कैसे पहुंची। यानी देश की सीमाओं, चीन की घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर सवालों को छोड़कर सत्ता इस तकनीकी बहस में फंस गई है। यह वही पुरानी रणनीति है—मुद्दे को भटका दो, ताकि असली सवाल दब जाए।
सच यह है कि किताब की छपाई से ज़्यादा डर किताब में लिखी बातों से है। अगर सब कुछ झूठ है, तो सरकार को चाहिए था कि वह खुलकर संसद में जवाब देती, दस्तावेज़ रखती और तथ्यों से राहुल गांधी के दावे को खारिज करती। लेकिन सच का सामना करने की हिम्मत न होने पर एफआईआर का सहारा लिया गया।
राहुल गांधी के सवालों से घबराई सत्ता
राहुल गांधी ने संसद में जो सवाल उठाया, वह किसी अफवाह पर आधारित नहीं था। उन्होंने कहा कि जनरल नरवणे की किताब में यह स्वीकार किया गया है कि चीन ने लद्दाख में घुसपैठ की थी। यही वह बात है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार लगातार नकारते आए हैं। जब यह बात एक पूर्व सेना प्रमुख की किताब से सामने आती है, तो सरकार की पूरी कहानी पर सवाल खड़े हो जाते हैं।
यही वजह है कि बहस से भागकर सत्ता अब कानूनी डराने की रणनीति अपना रही है। एफआईआर का मकसद साफ है—जो सवाल पूछे, उसे उलझा दो; जो सच सामने लाए, उसे मुकदमों में फंसा दो।
तानाशाही की पहचान: सवालों से डर और सच से परहेज़
लोकतंत्र में सरकारें सवालों का जवाब देती हैं। तानाशाही में सवाल पूछने वालों पर केस दर्ज होते हैं। यह फर्क अब और साफ होता जा रहा है। घपले-घोटालों से घिरी सत्ता सच्चाई की दुनिया में नहीं रहना चाहती। झूठ का एक समानांतर संसार रचा गया है, जहां सवाल पूछना गुनाह है और जवाब मांगना देशद्रोह।
यह पहली बार नहीं है। कभी पत्रकारों पर, कभी छात्रों पर, कभी विपक्षी नेताओं पर—हर बार सत्ता का एक ही जवाब रहा है: मुकदमा। अब किताबों से भी डर लगने लगा है। यह डर उस सरकार का है, जिसे पता है कि सच बाहर आया तो झूठ की पूरी इमारत ढह जाएगी।
किताब से नहीं, सच्चाई से डर
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आज की सत्ता किताब से नहीं, बल्कि सच्चाई से डरती है। अगर सरकार ईमानदार होती, तो वह संसद में खड़ी होकर कहती—यह सच है या यह झूठ है, और इसके सबूत पेश करती। लेकिन जो सरकार एफआईआर के पीछे छिपती है, वह खुद अपने दावों पर भरोसा नहीं कर पा रही।
देश यह सब देख रहा है। सवाल यह नहीं है कि किताब छपी या नहीं। सवाल यह है कि चीन की घुसपैठ पर सच क्या है? और जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलेगा, तब तक एफआईआर, डर और दमन—सब कुछ तानाशाही की ही पहचान बने रहेंगे।




