यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और विश्वस्तरीय इंजीनियरिंग सामर्थ्य रखने वाला देश जर्मनी आज एक ऐसी चुनौती से जूझ रहा है, जो उसके रक्षा उद्योग की रीढ़ को ही कमजोर कर सकती है। रक्षा उपकरणों, मिसाइल प्रणालियों, रडार, पनडुब्बियों और उन्नत संवेदक तकनीकों में जिन “रेयर अर्थ” यानी दुर्लभ पृथ्वी तत्वों की जरूरत होती है — उनकी आपूर्ति पर चीन का लगभग एकाधिकार बना हुआ है। जर्मन रक्षा उद्योग संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि यह निर्भरता समय रहते कम नहीं की गई, तो भविष्य में सैन्य उपकरणों का उत्पादन रुक भी सकता है। यही कारण है कि जर्मनी की राष्ट्रीय सुरक्षा बहस में इन दिनों रेयर अर्थ तत्वों की आपूर्ति सबसे बड़ा मुद्दा बन चुकी है।
दुर्लभ पृथ्वी तत्व 17 प्रकार के धात्विक तत्व हैं जो आधुनिक युद्धक तकनीकों में बेहद अनिवार्य माने जाते हैं। मिसाइलों को सटीक दिशा देने वाले सेंसरों से लेकर फाइटर जेट्स के इंजन और अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम — हर जगह इनकी जरूरत होती है। विडंबना यह है कि विश्व भर में इन तत्वों का खनन और प्रोसेसिंग लगभग पूरी तरह चीन के हाथों में है। आंकड़े बताते हैं कि चीन न केवल वैश्विक उत्पादन में अग्रणी है, बल्कि कच्चे तत्वों को रक्षा-उपयोगी चुंबकों में रूपांतरित करने की 90% से अधिक क्षमता भी उसी के पास है। ऐसे में जर्मनी जैसी सामरिक शक्ति के लिए यह निर्भरता एक “रणनीतिक जोखिम” के रूप में देखी जा रही है।
चिंता इसलिए भी गहरी है क्योंकि चीन ने पिछले महीनों में निर्यात नियम और लाइसेंसिंग व्यवस्था को कड़ा कर दिया है। अब कंपनियों को यह प्रमाणित करना होगा कि रेयर अर्थ से बने उत्पाद कहाँ और किस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल होंगे। सीधे शब्दों में कहें तो रक्षा क्षेत्र की आपूर्ति-श्रृंखला चीन की राजनीतिक और सैन्य नीति के संकेतों पर निर्भर हो सकती है। जर्मनी को डर है कि चीन यदि तनावपूर्ण वैश्विक परिस्थिति में इन निर्यातों को हथियार बनाता है, तो यूरोपीय रक्षा उद्योग के पहिए थम सकते हैं। फिलहाल उत्पादन पर सीधा असर नहीं पड़ा है, लेकिन कंपनियों का कहना है कि कुछ उपकरणों के लिए कोई विकल्प उपलब्ध ही नहीं है — एक भी कड़ी टूटे, तो पूरा रक्षा उत्पादन खतरे में पड़ जाएगा।
जर्मनी और यूरोपीय संघ इस निर्भरता को कम करने की कोशिश में जुटे हैं। यूरोपीय संघ ने Critical Raw Materials Act के तहत यह लक्ष्य तय किया है कि 2030 के बाद किसी भी आवश्यक खनिज के लिए किसी एक राष्ट्र पर 65% से अधिक निर्भरता नहीं रहेगी। जर्मनी ने भी एक राष्ट्रीय फंड बनाकर संसाधनों के नए स्रोत तलाशने, रिसाइक्लिंग तकनीक विकसित करने और घरेलू क्षमताएँ बढ़ाने की योजना शुरू की है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि खनन अनुमति, पर्यावरण नियमों और भारी लागत की वजह से इन प्रयासों को जमीन पर उतरने में वर्षों लग जाएंगे।
समस्या का दूसरा पहलू यह भी है कि चीन इन तत्वों को अत्यंत कम कीमत पर संसाधित करके वैश्विक बाजार में उपलब्ध कराता रहा है। इससे अन्य देशों में खनन और प्रोसेसिंग उद्योग प्रतिस्पर्धा में टिक ही नहीं पाए। अब जब भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ बदल रही हैं, यूरोप समझ रहा है कि अल्पकालिक लागत-लाभ ने उसे दीर्घकालिक खतरे में धकेल दिया है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है — “यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि जर्मनी की सामरिक स्वायत्तता का प्रश्न है।”
हालाँकि, संभावनाओं के द्वार पूरी तरह बंद नहीं हैं। जर्मन वैज्ञानिक चुंबक-रहित मोटर और उच्चस्तरीय रिसाइक्लिंग तकनीक पर तेजी से काम कर रहे हैं। लेकिन यह भविष्य की आशाएँ हैं। वर्तमान संकट यह दर्शाता है कि नई तकनीकी शक्तियों की लड़ाई केवल हथियारों की नहीं, बल्कि उन धातुओं और खनिजों की है जिनसे हथियार बनते हैं। यदि जर्मनी और यूरोप ने समय रहते अपनी आपूर्ति-श्रृंखला सुरक्षित नहीं की, तो अपनी रक्षा-ताकत खतरे में पाकर उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।




