राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम | 1 अप्रैल 2026
विदेशी चंदा विनियमन अधिनियम (FCRA) में प्रस्तावित संशोधन को लेकर देश की राजनीति अचानक गर्मा गई है। संसद के भीतर विपक्षी दलों का तीखा विरोध और केरल जैसे चुनावी राज्य में इस मुद्दे का उछलना यह दिखाता है कि मामला केवल एक कानूनी बदलाव भर नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक और सामाजिक असर वाला बन चुका है। केंद्र सरकार जहां इसे पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर पेश कर रही है, वहीं विपक्ष इसे संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बता रहा है।
सरकार द्वारा लाए गए इस संशोधन में सबसे अधिक विवाद उस प्रावधान को लेकर है, जिसमें यह व्यवस्था प्रस्तावित की गई है कि यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द होता है, तो उसकी संपत्तियों पर सरकार का नियंत्रण हो सकता है। इसके साथ ही, बिना अनुमति संपत्ति के हस्तांतरण या बिक्री पर रोक जैसे प्रावधान भी शामिल हैं। इन बदलावों को लेकर आशंका जताई जा रही है कि हजारों गैर-सरकारी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक ट्रस्टों की कार्यप्रणाली पर सीधा असर पड़ सकता है।
विपक्ष का आरोप है कि इस कानून के जरिए सरकार प्रशासनिक शक्तियों का अत्यधिक केंद्रीकरण कर रही है। कांग्रेस, वाम दलों और कई क्षेत्रीय पार्टियों ने इसे नागरिक समाज की आवाज को कमजोर करने की कोशिश बताया है। उनका कहना है कि इससे खास तौर पर अल्पसंख्यक संस्थाएं और सामाजिक संगठन दबाव में आ सकते हैं। संसद में इस मुद्दे पर जोरदार नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिला, जिससे साफ है कि विपक्ष इस मुद्दे को बड़े राजनीतिक अभियान में बदलने की तैयारी कर चुका है।
केरल में होने वाले विधानसभा चुनाव के संदर्भ में यह मुद्दा और संवेदनशील हो गया है। राज्य के कई राजनीतिक और धार्मिक संगठनों ने इस बिल को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि इससे चर्च से जुड़े संस्थानों, शैक्षणिक ढांचों और सामाजिक सेवाओं पर असर पड़ सकता है। चुनावी रैलियों और सभाओं में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया जा रहा है, जिससे स्पष्ट है कि यह बिल अब चुनावी बहस का भी हिस्सा बन चुका है।
केंद्र सरकार ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि यह संशोधन केवल उन संस्थाओं को प्रभावित करेगा जो नियमों का उल्लंघन करती हैं। सरकार का कहना है कि विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग को रोकना और पारदर्शिता सुनिश्चित करना आवश्यक है, और यही इस कानून का मुख्य उद्देश्य है। सरकार के अनुसार, ईमानदारी से काम कर रही संस्थाओं को इससे डरने की जरूरत नहीं है।
जहां तक सरकार के पीछे हटने का सवाल है, फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है। विरोध के बावजूद बिल को संसद में पेश किया गया और सरकार अपने रुख पर कायम नजर आ रही है। हालांकि, राजनीतिक दबाव और चुनावी समीकरणों को देखते हुए आगे चलकर इसमें कुछ संशोधन या नरमी की संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता। FCRA संशोधन बिल 2026 ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है—क्या यह कदम देशहित में जरूरी सख्ती है या फिर लोकतांत्रिक संस्थाओं पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश। इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में संसद और सियासत दोनों जगह तय होगा।




