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चुनाव आयोग की चुप्पी और संदेहों की गूंज — क्या लोकतंत्र केवल “डाटा जारी करने” तक सीमित हो चुका है?

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नई दिल्ली 6 नवंबर 2025

हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 पर जारी चुनाव आयोग का तथ्यपत्र देखने में तो बेहद तकनीकी और साफ-सुथरा लगता है, लेकिन इसके भीतर छिपे सवालों ने लोकतंत्र की नींव को झकझोर दिया है। आयोग का दावा है कि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट 2 अगस्त 2024 को सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को दे दी गई थी और विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण के दौरान कुल 4,16,408 दावे और आपत्तियां प्राप्त हुईं। यह आंकड़ा बेहद बड़ा है — इतने ज्यादा दावे बताता है कि मतदाता सूची में व्यापक त्रुटियां थीं। लेकिन इसी के बाद जो कहानी सुनाई जाती है, वह संदेहों की दीवार खड़ी कर देती है। यह कहा जाता है कि न तो जिलाधिकारियों के पास एक भी पहली अपील पहुंची, न ही मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास दूसरी अपील दायर हुई। स्क्रूटनी के दौरान उम्मीदवारों ने एक भी शिकायत नहीं उठाई और गिनती के दौरान केवल 5 मामूली आपत्तियाँ आईं। यह निष्कर्ष एक ऐसे चुनावी तंत्र की तस्वीर खींचता है जिसमें हर चीज चमत्कारिक रूप से ‘सही’ रही — लेकिन क्या यह सच में संभव है? क्या करोड़ों मतदाताओं के डेटा सुधार में लाखों दावों का उठना और फिर अचानक सबका चुपचाप गायब हो जाना लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया कहलाएगा?

गंभीर सवाल यह है कि जब सैकड़ों हजारों लोगों ने अपने नाम गलत पाए, तो फिर किस जादू से वे सभी आपत्तियाँ बिना अपील किए निपट गईं? क्या सभी त्रुटियां स्वतः ही ठीक कर दी गईं? क्या हर मतदाता अपनी आपत्ति के समाधान से संतुष्ट हो गया? क्या चुनाव आयोग के इस दावे पर आंख मूंदकर भरोसा कर लिया जाए कि सबकुछ “शून्य विवाद” में बदल गया? क्योंकि राजनीतिक दलों और विपक्षी नेताओं का कहना है कि जमीनी स्तर पर न तो उन्हें पूरी मतदाता सूची समय पर मिली, न ही सुधार की प्रक्रिया में उन्हें उचित भागीदारी दी गई। यदि ऐसा है तो फिर चुनाव आयोग का यह दावा अधिकतर प्रश्नों को दबा देने जैसा प्रतीत होता है।

इसी मुद्दे को पत्रकार राजू परेलकर ने X पर तीखे शब्दों में उठाया है। उनका कहना है कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में जब लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष इतनी गंभीर विसंगतियों की ओर इशारा करते हैं, तो आयोग की पहली जिम्मेदारी होती है कि वह सामने आए, जनता के बीच जवाब दे, और आरोपों का खंडन खुले मंच पर करे। परंतु इसके विपरीत — आधिकारिक बयान बिना हस्ताक्षर के सोशल मीडिया पोस्ट के रूप में जारी किया जा रहा है। संवैधानिक संस्था का यह तंत्र क्या अब X.com नोटिस बोर्ड बनकर रह गया है? क्या यह लोकतंत्र की पारदर्शिता को नए खतरे में डालने जैसा नहीं? एक ओर सरकारें कहती हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है — वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग जैसे सर्वोच्च चुनावी संस्थान की कार्यवाही एक साधारण ग्राफिक पोस्ट तक सीमित कर दी जाती है। इससे यह आशंका मजबूत होती है कि जवाबदेही से बचने के लिए जानबूझकर औपचारिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस और दस्तावेजी हस्ताक्षर से दूरी बनाई जा रही है।

परेलकर के पोस्ट का सबसे कड़वा लेकिन सबसे यथार्थपूर्ण सवाल यही है —“क्या चुनाव मशीनरी में ऐसा कोई ईमानदार अधिकारी नहीं बचा, जो पूरी योजना, चालबाज़ी और धांधली के तंत्र को सामने लाए? या फिर डर इतना बड़ा है कि सच बोलना करियर खत्म कर देने वाला अपराध बन गया है?”

भारत में चुनाव आयोग एक ऐसा स्तंभ माना जाता रहा है जिसे देखकर दुनिया सीखती थी — पर आज हालात ये हैं कि सोशल मीडिया पर ही उसकी पारदर्शिता, साहस और निष्पक्षता को लेकर गंभीर संदेह पैदा हो रहे हैं। क्या यह डर है? या फिर सत्ता-संरक्षित संरचना के भीतर छिपा वह बड़ा खेल जिसे उजागर करने की हिम्मत कोई नहीं करता? क्या IAS अधिकारी इसीलिए चुप हैं क्योंकि सच बोलकर सब कुछ खो सकते हैं — या इसलिए चुप हैं क्योंकि सत्ता की निकटता ने उन्हें बहुत कुछ दिला रखा है?

इस पूरे मामले ने यह साबित कर दिया है कि असली संकट चुनाव नतीजों पर विवाद का नहीं, विश्वास के टूटने का है। लोकतंत्र वहां कमजोर होता है, जहां जनता यह महसूस करे कि उसके वोट की क़ीमत आंकड़ों, ऐप्स, पोर्टल्स और अनसाइन्ड पोस्टों में बदल दी गई है। और जब सवाल पूछने वालों को ही संदिग्ध बना दिया जाए — तब समझ लीजिए कि लोकतंत्र खतरे में है।

आज जनता यही पूछ रही है—क्या चुनाव आयोग स्वतंत्र है या सरकारी आंकड़ाबाज़ी का मुखपत्र? क्या लोकतंत्र भय की दीवार में कैद हो चुका है? क्या सत्ता से बड़ा अब कोई सच नहीं बचा?

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