नई दिल्ली 13 नवंबर 2025
दिल्ली के दिल में, संसद और राष्ट्रपति भवन जैसी अतिसुरक्षित इमारतों से कुछ ही दूरी पर, और लाल किले जैसे ऐतिहासिक और संवेदनशील स्थल के बेहद पास हुए भीषण विस्फोट ने पूरे देश को दहला दिया है। इस घटना में 13 निर्दोष लोगों ने अपनी जान गंवा दी, जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। यह हमला केवल जान-माल का नुकसान नहीं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा एजेंसियों की तैयारियों और सतर्कता पर भी बड़ा सवालिया निशान है। यह सोचकर ही मन सिहर उठता है कि देश की राजधानी, जहां हर कदम पर सुरक्षा का दावा किया जाता है, वहां इस स्तर का विस्फोट कैसे हो गया। जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों के लिए संवेदनाएं और घायलों के लिए प्रार्थनाएं—सभी के दिलों में एक ही सवाल है: दिल्ली जैसे सुरक्षित समझे जाने वाले शहर में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई?
चौंकाने वाली बात यह है कि इस भयावह घटना के पूरे 48 घंटे बाद जाकर केंद्र सरकार और कैबिनेट ने इसे एक आतंकी हमला माना। दो दिन तक खामोशी, अस्पष्ट बयान और आधी-अधूरी जानकारी—ये सब मिलकर चिंताओं को और बढ़ाते हैं। क्या सुरक्षा एजेंसियां असमंजस में थीं? क्या कोई जानकारी छुपाई गई? या फिर सरकार के भीतर समन्वय की गंभीर कमी है? AICC मीडिया और पब्लिसिटी विभाग के चेयरमैन पवन खेड़ा का कहना है कि यह देरी अपने आप में कई सवाल खड़े करती है, और यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े आतंकी हमले के बाद सरकार के बयान में देरी या अस्पष्टता देखने को मिली हो। उन्होंने पुलवामा हमले का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी RDX कैसे पहुंचा—इसका जवाब आज तक देश को नहीं दिया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब देश के गृह मंत्री अमित शाह स्वयं सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी करते हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल लगातार “पैनी नजर” की बात करते हैं, तो फिर यह चूक कैसे हो गई? पवन खेड़ा का आरोप है कि यह केवल एक विस्फोट नहीं, बल्कि सुरक्षा ढांचे की गहरी विफलता है। उन्होंने पूछा कि दिल्ली से सिर्फ 20 किलोमीटर दूर, फरीदाबाद में 2,900 किलो विस्फोटक सामग्री कैसे जमा हो गई? यह मात्रा छोटी नहीं है—यह एक ऐसा खतरा है जिसे पहचानना और रोकना सुरक्षा एजेंसियों की पहली जिम्मेदारी थी। अगर इतनी भारी मात्रा में विस्फोटक राजधानी की दहलीज तक पहुंच गया, तो पूरे सिस्टम की कमजोरियां और उन कमजोरियों का लाभ उठा रही ताकतें दोनों बेहद खतरनाक हैं।
लाल किले के पास हुए धमाके के बाद जो दृश्य सामने आए, उन्होंने देश भर में दहशत फैलाने का काम किया। जमीन पर बिखरे अवशेष, घायलों की चीखें, और असमंजस में खड़ी पुलिस व राहत टीमें—यह सब एक बड़े सवाल को जन्म देता है कि आखिर इस विफलता की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या यह पुलिस का इंटेलिजेंस फेल्योर था? क्या केंद्रीय एजेंसियां इस खतरे को पहचान नहीं सकीं? क्या हम तीसरी बार यही सुनेंगे कि “इनपुट था, लेकिन समय पर कार्रवाई नहीं हो सकी”? देश अब इन बहानों को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है।
इसीलिए कांग्रेस की ओर से पवन खेड़ा ने स्पष्ट मांग रखी है कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक सर्वदलीय बैठक तुरंत बुलाई जाए। इस तरह के राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों पर दलगत राजनीति नहीं, बल्कि सामूहिक और पारदर्शी कार्रवाई की जरूरत होती है। इसके साथ ही यह भी मांग उठाई गई है कि संसद का सत्र जल्द से जल्द बुलाया जाए ताकि इस हमले पर विस्तृत चर्चा हो सके, और जवाबदेही तय की जा सके। विपक्ष ने साफ कहा है कि सरकार मजबूत कार्रवाई करे—और जहां जरूरत होगी, विपक्ष सरकार का साथ देने के लिए तैयार है। लेकिन अंधेरे में रखकर, चुप्पी साधकर या आधी जानकारी देकर राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
दिल्ली पर यह हमला केवल एक घटना नहीं—यह चेतावनी है कि अगर सिस्टम की कमजोरियों को तत्काल नहीं सुधारा गया, तो आने वाले समय में खतरे और भी बढ़ सकते हैं। देश को एकजुट होकर, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ इस चुनौती का सामना करना होगा। सरकार से लेकर सुरक्षा एजेंसियों तक—हर स्तर पर ईमानदार समीक्षा और तेज कार्रवाई अनिवार्य है।





