बिहार में चुनावी माहौल अब चरम पर पहुँच चुका है और विशाल जनसभाएँ लगातार यह संकेत दे रही हैं कि राज्य की जनता इस बार 20 साल पुरानी व्यवस्था को पीछे छोड़ एक नए राजनीतिक अध्याय की तरफ बढ़ना चाहती है। भीड़ का उत्साह, युवाओं की बेचैनी और रोज़गार की उम्मीदें अब एक नए नेतृत्व के प्रति भरोसा जता रही हैं। इसी भरोसे को तेजस्वी प्रसाद यादव एक नई आकांक्षा में बदलते दिख रहे हैं। वह कहते हैं कि इस बार का चुनाव केवल सत्ता का परिवर्तन नहीं, बल्कि विचार, व्यवस्था और नेतृत्व का पूर्ण बदलाव है। उनके अनुसार बिहार उन ताकतों से मुक्त होना चाहता है जिन्होंने दो दशकों तक विकास के नाम पर नतीजों की जगह नारों को शासन में बदल दिया।
तेजस्वी यादव पूरी आत्मविश्वास के साथ यह घोषणा कर चुके हैं कि 14 नवंबर को परिणाम आएंगे और 18 नवंबर को वह मुख्यमंत्री की शपथ लेंगे। उन्होंने यह भी ऐलान किया कि उनकी सरकार बनने के पहले 60 दिनों के भीतर यानी 26 जनवरी तक बिहार में अपराध और असामाजिक तत्वों पर सबसे बड़ी चोट की जाएगी — “जो भी अपराधी हैं, चाहे किसी भी जाति, वर्ग, बिरादरी या राजनीतिक संरक्षण से जुड़े हों — सभी जेल में होंगे।” तेजस्वी ने कहा कि अपराध के सवाल पर किसी को बख्शा नहीं जाएगा और बिहार को वह फिर से अपराध-मुक्त राज्य बनाएँगे। वह कहते हैं — “जहाँ सरकार बने, वहाँ जनता सुरक्षित महसूस करे; भय से नहीं, अधिकार से सत्ता चले।”
तेजस्वी ने बीजेपी-जेडीयू गठबंधन पर तीखा हमला करते हुए कहा कि “नीतीश चाचा अब बिहार नहीं चला रहे, उन्हें दिल्ली चला रही है।” उनका सीधा आरोप है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने नीतीश कुमार को पूरी तरह अपने अधीन कर लिया है — “हमारे चाचा को यहाँ कुछ समझ नहीं आता, सब दिल्ली की स्क्रिप्ट के मुताबिक चल रहा है।” तेजस्वी का कहना है कि बिहार को बाहर के राजनीतिक हितों का क्षेत्र समझकर हथियाने की कोशिश की जा रही है, जबकि बिहार की आत्मा अपनी ज़मीन, अपने सम्मान और अपने भविष्य को खुद तय करना चाहती है।
तेजस्वी यादव का दावा है कि युवाओं का यह समर्थन इसलिए उमड़ा है क्योंकि उन्होंने अपनी राजनीति को नौकरी, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, और भ्रष्टाचार के अंत पर आधारित किया है। वह बार-बार याद दिलाते हैं कि जब उन्हें उपमुख्यमंत्री का मौका मिला था, तब 70 लाख नौकरियाँ देने की प्रक्रिया शुरू की गई थी, जिसे बाद की सरकारों ने रोक दिया। अब वह इसे और बड़े लक्ष्य के साथ आगे बढ़ाना चाहते हैं। वह कहते हैं — “यह चुनाव जाति की राजनीति बनाम नौकरी-की-राजनीति का फैसला करेगा। बिहार अब समाज को बाँटने वाली राजनीति नहीं, समाज को जोड़ने वाले अवसर चाहता है।”
रैलियों से उठती नारों की गूँज और जनसागर की लहर यह संकेत दे रही है कि इस बार जनता के सामने सवाल केवल “किसे सत्ता?” नहीं है — बल्कि “क्यों सत्ता?” है। यह नई सोच उन 15 वर्षों के युवाओं की है जिन्होंने अपनी ज़िंदगी का हर महत्वपूर्ण सपना बेरोज़गारी और पलायन में खोया है। वे अब किसी तमाशे या बहाने के साथ नहीं — नौकरी और सम्मान की माँग के साथ वोट डाल रहे हैं। वे एक ऐसे बिहार का भविष्य चाहते हैं जहाँ दिल्ली की इच्छा नहीं, पटना की जनता का निर्णय चले।
तेजस्वी का यह भी कहना है कि जब वह सत्ता में आएँगे, तो “जंगलराज” की पुरानी चर्चा का अंत हो जाएगा — और जो लोग आज अपराध को संरक्षण देते हैं, उन्हें ही कानून के शिकंजे में कसा जाएगा। वह कहते हैं — “ये चुनाव बिहार को डर से निकालकर अधिकार के युग में ले जाने वाला चुनाव है।”




