आलोक कुमार | नई दिल्ली 20 नवंबर 2025
नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी असर वाली सलाहकारी राय देते हुए साफ कर दिया कि राज्यपाल और राष्ट्रपति राज्य विधायिका द्वारा पारित बिलों को अनिश्चितकाल तक लटकाकर नहीं रख सकते। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संवैधानिक ढांचे में राज्यपालों के पास सिर्फ तीन विकल्प हैं—असेंट देना, असेंट रोकना और बिल वापस भेजना, या बिल को राष्ट्रपति के पास भेजना। चौथा रास्ता यानी फाइल दबाकर महीनों या सालों तक चुप बैठना, पूरी तरह असंवैधानिक है। यह फैसला उस समय आया है जब केरल, तमिलनाडु, पंजाब और तेलंगाना जैसे गैर-बीजेपी शासित राज्यों में लंबे समय से बिलों को रोकने और राज्यपालों की भूमिका पर तीखा राजनीतिक विवाद चल रहा था।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अगुवाई वाली पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने अनुच्छेद 200 और 201 की ऐतिहासिक व्याख्या करते हुए कहा कि राज्यपाल कार्यपालिका का हिस्सा हैं—वे न तो विधायिका से ऊपर हैं और न ही उनके पास किसी ‘सुपर वीटो’ जैसा कोई अप्रत्यक्ष अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को बिल पर “जितनी जल्दी संभव हो” निर्णय लेना चाहिए, हालांकि इस ‘जितनी जल्दी’ को कैलेंडर में बांधना न्यायपालिका का क्षेत्र नहीं है। लेकिन अदालत ने यह चेतावनी भी दे दी कि यदि राज्यपाल बिना कारण बताए महीनों या वर्षों तक बिल लंबित रखते हैं, तो यह सत्ता का दुरुपयोग माना जाएगा और अदालत मामले-दर-मामले आधार पर उन्हें निर्णय लेने के लिए बाध्य कर सकती है। इस प्रकार अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि ‘निर्धारित समय बीत जाने पर डीम्ड असेंट’ का सिद्धांत लागू नहीं होगा, क्योंकि संविधान इसकी अनुमति नहीं देता।
इस ऐतिहासिक फैसला ने उन सभी राज्यपालों पर सीधी चोट की है जिन पर विपक्षी राज्यों की सरकारें कई वर्षों से आरोप लगा रही थीं कि वे राजनीतिक दबाव में बिलों को रोकते हैं, राष्ट्रपति भवन को रेफर करते हैं या फाइलें ठंडी करके बैठे रहते हैं। कोर्ट ने इस प्रवृत्ति को सहकारी संघवाद की भावना के खिलाफ बताया और कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को अपनी सीमाएं याद रखनी चाहिए। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि अगर कोई राज्यपाल अनावश्यक देरी करता है, तो राज्य सरकारें बिल दोबारा पास करके भेज सकती हैं, और इस बार राज्यपाल को मजबूरन अपना निर्णय रखना होगा।
फैसले के तुरंत बाद राजनीतिक तापमान तेजी से बढ़ गया। डीएमके, कांग्रेस, टीएमसी, आप और वाम दलों ने इसे “संघीय ढांचे की जीत” बताते हुए कहा कि यह निर्णय राज्यपालों की मनमानी पर सीधा ब्रेक लगाएगा। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने खुलकर स्वागत किया और कहा कि अब उनके लटके हुए 20 से ज्यादा विधेयकों के रास्ते साफ होंगे। वहीं बीजेपी खेमे ने इसे “न्यायिक अतिक्रमण” बताया। कुछ बीजेपी नेताओं ने यह तक तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट को उल्टा राज्यपालों पर समय-सीमा थोपनी चाहिए थी और कॉलेजियम नियुक्तियों में भी ‘डीम्ड अप्रूवल’ लागू करना चाहिए।
इस बीच सर्वोच्च न्यायालय ने केरल सरकार द्वारा उठाए गए सात विवादित विधेयकों पर राज्यपालों से स्पष्टीकरण भी मांगा है कि उन्होंने इतने लंबे समय तक चुप्पी क्यों साधे रखी। अदालत ने कहा कि यह मामला सिर्फ एक राज्य का नहीं, बल्कि पूरे देश के संघीय ढांचे की जड़ों को छूता है। इस तरह यह फैसला न केवल तत्काल राजनीतिक टकराव कम करेगा, बल्कि आने वाले समय में राज्यों और राज्यपालों के संबंधों की नई परिभाषा भी तय करेगा।
कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि राज्यपाल “केन्द्र के एजेंट” नहीं, बल्कि “संवैधानिक प्रमुख” हैं—और अब उनके लिए फाइलों को लटकाकर रखने का रास्ता बंद हो चुका है। आने वाले दिनों में सबसे बड़ी नजर इस बात पर रहेगी कि गैर-बीजेपी शासित राज्यों के राज्यपाल इस आदेश के बाद कितनी तेजी से लंबित फाइलों को निपटाते हैं और क्या भारतीय संघवाद एक नए संतुलन की ओर बढ़ता दिखाई देता है।




