नई दिल्ली 11 नवंबर 2025
देशभर में मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर छिड़ी कानूनी जंग मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के भीतर एक गंभीर बहस में बदल गई। जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने DMK और चुनाव सुधारों पर काम करने वाले NGO ADR की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी किया, साथ ही देशभर के हाई कोर्ट्स से SIR से जुड़ी सभी लंबित सुनवाई को अभी के लिए टालने का आग्रह किया। यह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि EC ने शिकायत की थी कि देशभर के अलग-अलग हाई कोर्ट्स में SIR के विरुद्ध समानांतर सुनवाई चल रही है, जिससे प्रक्रिया और कानून—दोनों में भ्रम पैदा हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा “गंभीर संवैधानिक महत्व” का है और इसे एक समेकित दृष्टिकोण से निपटाया जाना चाहिए। कोर्ट ने SIR की वैधता से जुड़ी सभी छह याचिकाओं पर नोटिस जारी कर दिया और अगली सुनवाई की तारीख 26 नवंबर तय कर दी।
सुनवाई की शुरुआत में ही वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, DMK की याचिका पर बहस करते हुए, SIR की टाइमलाइन, तरीके और मंशा—तीनों पर सवाल उठाते दिखे। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग इस पूरी प्रक्रिया को इतनी जल्दबाज़ी में चला रहा है कि यह ग्रामीण, गरीब और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों के अधिकारों को सीधे प्रभावित करता है। उन्होंने तमिलनाडु का उदाहरण देते हुए कहा कि जब राज्य में बारिश, त्योहारों और कृषि मौसम का सबसे महत्वपूर्ण समय चल रहा है, तब ऐसे भारी-भरकम कार्य को शुरू करना “फार्सिकल”—यानी व्यर्थ और असंभव—हो जाता है। सिब्बल ने चेतावनी दी कि यदि ऐसा ही चलता रहा, तो लाखों वैध मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं, और “देश का भविष्य SIR की प्रक्रिया पर निर्भर कर सकता है।” उनके अनुसार यह मामला सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि लोकतंत्र के हृदय को छूने वाला प्रश्न है।
ADR की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि चुनाव आयोग SIR के बहाने नागरिकता की जांच करने की कोशिश कर रहा है—जो उसके अधिकार क्षेत्र में आता ही नहीं। उन्होंने कहा कि दोहरे नाम हटाने के लिए EC के पास पहले से मौजूद सॉफ्टवेयर और सिस्टम काफी हैं, और ग्राम सभाओं के माध्यम से स्थानीय सत्यापन करवाकर अधिक पारदर्शी और लोकतांत्रिक तरीका अपनाया जा सकता था। भूषण ने यह भी तर्क दिया कि चुनाव आयोग मतदाता सूची को मशीन-रीडेबल बनाने से परहेज क्यों कर रहा है, जबकि पारदर्शिता के लिहाज से यह जरूरी कदम है। इस पर जस्टिस बागची ने डेटा प्राइवेसी को लेकर चिंता जताई और कहा कि EC “डेटा को पब्लिक ट्रस्ट में संभालता है” और उसे कई सुरक्षा परतों की जरूरत है, क्योंकि मशीन-रीडेबल डेटा का दुरुपयोग भी हो सकता है।
कोर्ट की ओर से लगातार यह सवाल उठता रहा कि क्या EC देश के हर राज्य की अलग परिस्थितियों को समझकर SIR जैसी विस्तृत प्रक्रिया चला रहा है? जस्टिस सूर्यकांत ने साफ कहा कि “जो बिहार में ज़रूरी लग रहा है, वह तमिलनाडु में आवश्यक नहीं हो सकता।” वहीं EC के वकील राकेश द्विवेदी ने तर्क दिया कि तमिलनाडु “देश के सबसे विकसित राज्यों में से एक है” और वहाँ डिजिटल व प्रशासनिक अड़चनें उतनी गंभीर नहीं हैं जितना दावा किया जा रहा है। परंतु सिब्बल का कहना था कि SIR का ढांचा ही कानूनी आधार, स्पष्ट टाइमलाइन और पर्याप्त संसाधनों के बिना खड़ा किया गया है—जिससे पूरा अभ्यास एक “confusing and disenfranchising” मशीनरी बन गया है।
सुनवाई के दौरान SIR को लेकर एक और बड़ी राजनीतिक आवाज़ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की आई, जिन्होंने SIR को “नोटबंदी जैसी जल्दबाजी और चुनावी तोड़फोड़” करार दिया। उन्होंने कहा कि इतनी विशाल प्रक्रिया को पूरा करने में कम से कम दो वर्ष लगने चाहिए, और EC इसे दो महीने में पूरा करने पर अड़ा हुआ है—जो संदेह पैदा करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि “BJP बंगाल चुनावों के लिए इसका इस्तेमाल कर रही है।” तमिलनाडु, बिहार और अब पश्चिम बंगाल—तीनों सरकारों की यह तीक्ष्ण प्रतिक्रिया SIR को लेकर उभरे राष्ट्रीय राजनीतिक टकराव को और व्यापक बनाती है।
उधर मद्रास हाई कोर्ट में चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि SIR के तहत तमिलनाडु में पूरी तरह नई मतदाता सूची तैयार होगी, जबकि सामान्य SSR प्रक्रिया सिर्फ अपडेट करती है। यानी तमिलनाडु के हर नागरिक को पुनः फॉर्म भरकर BLO के हाथ में जमा करना होगा—और यही वह बिंदु है जिसके कारण DMK और उसके सहयोगी SIR को “मताधिकार छीनने का सुनियोजित तरीका” कह रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा सारी याचिकाओं को एक साथ सुनने का निर्णय और हाई कोर्ट्स से तत्काल सुनवाई रोकने का आग्रह यह संकेत देता है कि आने वाले दिनों में SIR पर न्यायिक स्तर पर एक व्यापक और ऐतिहासिक बहस होने जा रही है। मतदाता सूची, नागरिकता, डेटा प्राइवेसी, चुनाव आयोग की शक्ति सीमा और लोकतांत्रिक अधिकार—सभी को एक ही बहस में शामिल होते देखना देश के राजनीतिक भविष्य का महत्वपूर्ण संकेत होगा। अब सबकी नज़र 26 नवंबर की अगली सुनवाई पर टिक गई है — जहां यह तय होगा कि SIR जारी रहेगा, संशोधित होगा या ठप पड़ेगा।




