शिक्षा / सुप्रीम कोर्ट / NCERT | अवधेश झा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 मई 2026
देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यपुस्तकों की सामग्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए NCERT की किताबों में प्रकाशित कार्टूनों की समीक्षा कराने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति से कहा कि वह यह जांच करे कि स्कूल की किताबों में इस्तेमाल किए जा रहे कार्टून और व्यंग्यात्मक चित्र वास्तव में उचित हैं या नहीं। अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब शिक्षा सामग्री में विचारधारा, प्रस्तुति और बच्चों पर उसके प्रभाव को लेकर देशभर में बहस तेज हो रही है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के सामने यह मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि “टेक्स्टबुक वह जगह नहीं है जहां कार्टूनों का इस्तेमाल किया जाए।” मेहता ने अदालत को बताया कि उन्होंने कुछ NCERT पुस्तकों में ऐसे कार्टून देखे हैं, जिन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए समीक्षा के आदेश दिए।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने शिक्षा जगत में नई बहस को जन्म दे दिया है। लंबे समय से NCERT की कई किताबों में राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों को समझाने के लिए कार्टून और व्यंग्यात्मक चित्रों का उपयोग किया जाता रहा है। समर्थकों का मानना है कि इससे जटिल विषयों को बच्चों के लिए सरल और रोचक बनाया जाता है, जबकि आलोचकों का कहना है कि कई बार ऐसे चित्र विवाद, वैचारिक पक्षपात या संवेदनशील मुद्दों के गलत संदेश का कारण बन सकते हैं।
सूत्रों के अनुसार अदालत के निर्देश के बाद बनने वाली समीक्षा प्रक्रिया में यह देखा जाएगा कि क्या पाठ्यपुस्तकों में शामिल कार्टून छात्रों के मानसिक विकास और शैक्षणिक उद्देश्यों के अनुरूप हैं या नहीं। यह भी जांच हो सकती है कि कहीं किसी समुदाय, व्यक्ति, संस्था या विचारधारा को लेकर अनुचित प्रस्तुति तो नहीं की गई। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में NCERT की सामग्री को लेकर व्यापक पुनरावलोकन शुरू हो सकता है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में NCERT की किताबों में कई अध्यायों, ऐतिहासिक घटनाओं और संदर्भों में बदलाव को लेकर लगातार राजनीतिक विवाद होते रहे हैं। अब कार्टून और चित्रों की समीक्षा का मुद्दा सामने आने के बाद यह बहस और तेज हो सकती है कि स्कूल शिक्षा का स्वरूप कितना “तटस्थ”, “रचनात्मक” या “संवेदनशील” होना चाहिए।
शिक्षा जगत के कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि कार्टून लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति और आलोचनात्मक सोच का हिस्सा होते हैं तथा बच्चों में विश्लेषण क्षमता विकसित करने में मदद करते हैं। वहीं दूसरी ओर कई अभिभावक और सामाजिक संगठन मानते हैं कि स्कूली किताबों में किसी भी प्रकार की व्यंग्यात्मक प्रस्तुति बेहद सावधानी से इस्तेमाल की जानी चाहिए क्योंकि उसका सीधा असर बच्चों की सोच और दृष्टिकोण पर पड़ता है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप ने साफ संकेत दिया है कि अब स्कूल पाठ्यपुस्तकों की सामग्री केवल अकादमिक विषय नहीं रह गई है, बल्कि वह सामाजिक संवेदनशीलता, वैचारिक संतुलन और शिक्षा नीति से जुड़ा बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुकी है। आने वाले दिनों में समिति की समीक्षा रिपोर्ट पर देशभर की नजरें टिकी रहेंगी, क्योंकि उसका असर भविष्य की NCERT पुस्तकों और शिक्षा व्यवस्था की दिशा दोनों पर पड़ सकता है।




