एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 11 मार्च 2026
देश की सर्वोच्च अदालत में उस दिन एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने कानून की सख्त दुनिया के भीतर छिपी मानवीय संवेदनाओं को उजागर कर दिया। Supreme Court of India में जब गंभीर बीमारी से जूझ रहे Harish Rana की इच्छामृत्यु से जुड़ी याचिका पर सुनवाई चल रही थी, तब अदालत का माहौल असाधारण रूप से गंभीर और भावनात्मक हो गया। अदालत में मौजूद हर व्यक्ति समझ रहा था कि यह केवल एक कानूनी बहस नहीं, बल्कि एक ऐसे आदमी की पीड़ा का प्रश्न है जो लंबे समय से असहनीय दर्द के साथ जी रहा था और जिसने अपनी जिंदगी की सबसे कठिन गुहार अदालत के सामने रखी थी।
सुनवाई के दौरान जब पीठ में शामिल न्यायाधीश J. B. Pardiwala ने मामले की परिस्थितियों पर अपनी बात रखनी शुरू की, तो उनके शब्दों में कानून की भाषा के साथ-साथ गहरी मानवीय संवेदना भी झलक रही थी। उन्होंने कहा कि न्यायालय केवल कानून की किताबों से संचालित नहीं होता, बल्कि उसे इंसान की पीड़ा और उसकी गरिमा को भी समझना होता है। जस्टिस पारदीवाला ने यह भी कहा कि न्यायाधीश होना कई बार बेहद कठिन जिम्मेदारी बन जाता है, क्योंकि कुछ फैसले ऐसे होते हैं जिनमें कानून और मानवीय भावनाओं के बीच बेहद नाजुक संतुलन बनाना पड़ता है।
जैसे-जैसे वे मामले की गंभीरता पर बोलते गए, अदालत का माहौल और अधिक शांत और गंभीर होता चला गया। कुछ पल ऐसे आए जब उनकी आवाज भारी हो गई और वे थोड़ी देर के लिए रुक गए। अदालत में मौजूद लोगों ने महसूस किया कि यह फैसला सुनाना उनके लिए भी आसान नहीं था। एक न्यायाधीश के रूप में उन्हें कानून के दायरे में रहकर निर्णय देना था, लेकिन एक इंसान के रूप में वे उस पीड़ा को भी महसूस कर रहे थे जिसे याचिकाकर्ता वर्षों से झेल रहा था। उस क्षण अदालत में उपस्थित कई लोगों की आंखें भी नम हो गईं।
हरीश राणा की स्थिति लंबे समय से बेहद गंभीर बताई जा रही थी। बीमारी ने उन्हें इस हद तक जकड़ लिया था कि उनका सामान्य जीवन लगभग समाप्त हो चुका था। वे लगातार असहनीय शारीरिक पीड़ा और निर्भरता के साथ जीवन जीने को मजबूर थे। इस स्थिति में उन्होंने अदालत से गुहार लगाई थी कि उन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए, ताकि वे उस अंतहीन पीड़ा से मुक्त हो सकें जो उनके लिए हर दिन एक नई यातना बन चुकी थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि भारतीय संविधान हर आदमी को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है और कई बार यही गरिमा जीवन और मृत्यु के प्रश्न से भी जुड़ जाती है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे मामलों में न्यायालय को बेहद सावधानी और संवेदनशीलता के साथ फैसला करना पड़ता है, क्योंकि एक तरफ व्यक्ति की पीड़ा है और दूसरी तरफ कानून की सीमाएं और समाज की जिम्मेदारी भी।
अंततः जब अदालत ने इच्छामृत्यु की अनुमति देने का निर्णय सुनाया, तो कोर्ट रूम में कुछ क्षणों के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। यह केवल एक कानूनी आदेश नहीं था, बल्कि एक ऐसे आदमी के दर्द को समझने और उसकी गरिमा का सम्मान करने का प्रयास भी था। उस पल जस्टिस पारदीवाला की नम आंखें यह याद दिला रही थीं कि न्याय की कुर्सी पर बैठा आदमी भी अंततः एक संवेदनशील दिल रखने वाला इंसान ही होता है, जो कानून का पालन करते हुए भी मानवता की आवाज को अनसुना नहीं कर सकता।




