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अचानक झटका! सरकार ने लेबर कोड किया लागू, ट्रेड यूनियनें भड़की—आंदोलन की तैयारी ?

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सुनील कुमार । 22 नवंबर 2025
केंद्र सरकार ने चौंकाने वाला फैसला लेते हुए संसद में 2019-20 के दौरान पारित किए गए चार श्रम कानूनों—वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा व स्वास्थ्य संहिता—को तत्काल प्रभाव से लागू करने की घोषणा कर दी। पिछले 5-6 सालों से इन कानूनों का लागू होना टलता रहा था, क्योंकि भारी विरोध, राज्यों की आपत्तियों और उद्योग जगत की तैयारी न होने का हवाला दिया जाता रहा। लेकिन अब अचानक इन नियमों को लागू करने के फैसले ने न केवल उद्योग जगत को चौंकाया है बल्कि ट्रेड यूनियनों में भी खलबली मचा दी है। यूनियनों का आरोप है कि यह फैसला बिना संवाद, बिना सहमति और बिना सामाजिक प्रभावों का आकलन किए लिया गया है, जिससे देश में व्यापक श्रमिक असंतोष और उग्र विरोध आंदोलन भड़क सकता है।
हड़ताल के अधिकार पर प्रहार: ट्रेड यूनियनों की सबसे बड़ी चिंता
नई संहिताओं को लेकर सबसे बड़ा विवाद हड़ताल के अधिकार पर प्रतिबंध को लेकर है। ट्रेड यूनियनों का कहना है कि नए प्रावधानों के तहत हड़ताल करना लगभग असंभव बना दिया गया है, क्योंकि किसी भी औद्योगिक प्रतिष्ठान में हड़ताल से पहले 14 दिनों का नोटिस देना अनिवार्य होगा और इस अवधि में सरकार इसे रोक सकती है। यूनियनों का आरोप है कि यह प्रावधान श्रमिकों की सामूहिक लड़ाई की क्षमता को खत्म करने का प्रयास है और इससे उद्योगपतियों को अनुचित लाभ मिलेगा। उनका कहना है कि यदि कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए भी आवाज उठाना चाहें, तो उन्हें कानूनी दंड और नौकरी गंवाने का खतरा उठाना पड़ेगा।
यूनियन पंजीकरण और निरस्तीकरण के नियम कठोर, सामूहिक bargaining कमजोर
नई श्रम संहिताओं में यूनियन पंजीकरण और निरस्तीकरण के प्रावधानों को लेकर भी गंभीर आपत्तियां हैं। यूनियनों का आरोप है कि सरकार ने ऐसे नियम जोड़ दिए हैं जिनसे ट्रेड यूनियनों को आसानी से डीरजिस्टर किया जा सकेगा, जिससे उनकी वैधता और सामूहिक सौदेबाजी की ताकत कमजोर होगी। यह कदम नियोक्ताओं के पक्ष में और श्रमिक संगठनों को कमजोर करने की दिशा में माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में पहले से ही यूनियन संरचना बिखरी हुई है और ऐसे कदम श्रमिकों की आवाज को और विभाजित कर देंगे।
51% समर्थन वाली एकल यूनियन की शर्त से प्रतिनिधित्व संकट
नई संहिताओं में यह प्रावधान किया गया है कि किसी भी उद्योग में केवल वही यूनियन मान्य negotiating body होगी, जिसे 51% श्रमिकों का समर्थन प्राप्त होगा। यूनियनों का कहना है कि यह अव्यवहारिक और विभाजनकारी शर्त है, क्योंकि कई उद्योगों में कई यूनियनें मौजूद हैं और किसी एक के लिए 51% समर्थन जुटाना मुश्किल होगा। परिणामस्वरूप श्रमिक प्रतिनिधित्व का संकट पैदा होगा, और मजदूरों की आवाज और कमजोर हो जाएगी।
हायरिंग-फायरिंग में कंपनियों को खुली छूट, श्रमिकों की नौकरी असुरक्षित
सबसे विवादित प्रावधानों में से एक है कर्मचारियों को हटाने के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता की सीमा को 100 से बढ़ाकर 300 कर्मचारियों तक कर देना। ट्रेड यूनियनों का कहना है कि इस बदलाव से कंपनियों को बिना सरकारी अनुमति के बड़े पैमाने पर छंटनी करने का अधिकार मिल जाएगा, जिससे लाखों श्रमिकों की नौकरी अस्थिर हो जाएगी। विपक्ष और श्रमिक संगठन आरोप लगाते हैं कि सरकार ने उद्योगपतियों के दबाव में यह फैसला लिया है, जिससे रोजगार सुरक्षा पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।
काम के घंटे बढ़ने का खतरा, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
काम के घंटों को लेकर भी गंभीर चिंता जताई जा रही है। आलोचकों का कहना है कि नए कोड 12 घंटे तक की शिफ्ट को बढ़ावा दे सकते हैं, जिससे 8 घंटे कार्यदिवस का मॉडल कमजोर होगा। इससे श्रमिकों की कार्य परिस्थितियाँ कठोर होंगी, थकान, तनाव, स्वास्थ्य समस्याएँ और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ेगा। यूनियनों का कहना है कि यह फैसला मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के विपरीत है।
वेतन की परिभाषा बदलने से न्यूनतम मजदूरी पर असर
वेतन की नई परिभाषा और न्यूनतम मजदूरी लागू करने के नियमों में बदलाव को लेकर भी भारी विरोध हो रहा है। ट्रेड यूनियनों का आरोप है कि वेतन की नई परिभाषा से कई भत्तों को हटा दिया जाएगा, जिससे वास्तविक आय घट जाएगी और न्यूनतम मजदूरी लागू होने की प्रक्रिया कमजोर पड़ेगी। इससे लाखों श्रमिकों का वेतन कम हो सकता है और उनका आर्थिक बोझ बढ़ सकता है।
असंगठित क्षेत्र और महिला श्रमिक सबसे ज्यादा प्रभावित
भारत की कार्यशक्ति का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है, और यूनियनों का कहना है कि नए श्रम कोड इनमें से अधिकांश श्रमिकों को सुरक्षा दायरे से बाहर कर देंगे। घरेलू काम, निर्माण, कृषि, दिहाड़ी मजदूरी जैसे क्षेत्रों के लिए यह बड़ा झटका माना जा रहा है। इसके साथ ही महिला श्रमिकों के लिए भी गंभीर चुनौतियाँ उभर सकती हैं, क्योंकि लचीली कार्य अनुसूचियाँ घरेलू और बाल देखभाल जिम्मेदारियों पर अतिरिक्त बोझ डालेंगी और उनके रोजगार अवसरों को सीमित कर देंगी।
देश में बड़े श्रमिक आंदोलन की आशंका
ट्रेड यूनियनों ने इस घोषणा के तुरंत बाद देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दे दी है। कई यूनियनों ने संयुक्त हड़ताल और प्रदर्शन की तैयारी शुरू कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार और यूनियनों के बीच संवाद नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में भारत बड़े पैमाने पर श्रम असंतोष, हड़तालों और औद्योगिक ठहराव का सामना कर सकता है।

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