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रूस से तेल बंद: राहुल गांधी सही थे?

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महेंद सिंह । नई दिल्ली 21 नवंबर 2025

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और ऊर्जा कूटनीति के बीच एक बड़ा भू-राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा वर्षों पहले दिए गए उन बयानों, जिनमें उन्होंने दावा किया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में हैं”, अब फिर से चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि तब और गंभीर हो गई जब उद्योग जगत की दिग्गज कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने अचानक यह घोषणा कर दी कि वह रूसी तेल की खरीद पूरी तरह बंद कर रही है, और इसके तुरंत बाद यह खबर भी सामने आई कि सरकारी तेल कंपनियाँ भी रूसी आयात को तेजी से कम कर रही हैं। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है और विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, इसे मोदी सरकार की “कमजोरी” और अमेरिकी दबाव के आगे “समर्पण” के संकेत के रूप में पेश कर रहा है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केरल से विधायक विजय थोट्टाथिल ने ट्विटर पर दावा किया कि राहुल गांधी दो साल पहले ही चेतावनी दे चुके थे कि मोदी सरकार डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में निर्णय लेने को मजबूर होगी। उन्होंने पुराने ट्वीट साझा किए जिनमें राहुल गांधी ने कहा था कि उस समय चल रही “अमेरिकी जांच” और “अडानी समूह से जुड़े कथित वित्तीय संबंधों” के कारण प्रधानमंत्री मोदी ट्रम्प के खिलाफ खड़े नहीं हो पाएंगे। राहुल गांधी का दावा था कि ट्रम्प सरकार भारत–रूस तेल सौदों, अडानी समूह और कथित वित्तीय लेनदेन को लेकर धमकियाँ दे रही थी—और यही कारण है कि मोदी सरकार के हाथ “बांध दिए गए थे”। विजय थोट्टाथिल ने इसे सीधे-सीधे जोड़ते हुए कहा कि मोदी सरकार की वर्तमान ऊर्जा नीति का अचानक बदल जाना “कोई संयोग नहीं, बल्कि ट्रम्प के प्रभाव का परिणाम” है।

भारतीय ऊर्जा नीति में यह बदलाव इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि रूस–यूक्रेन युद्ध के बाद से भारत रूस से बेहद सस्ते दाम पर कच्चा तेल खरीद रहा था और इससे देश की महंगाई, ईंधन कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा में बड़ा लाभ हुआ था। ऐसे समय में जब भारत ने इसे रणनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत किया था, अचानक आयात शून्य की ओर जाना आर्थिक विश्लेषकों को भी हैरान कर रहा है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत वास्तव में रूसी तेल पर निर्भरता समाप्त करता है, तो इसका प्रत्यक्ष असर ईंधन कीमतों, मौद्रिक नीति, व्यापार संतुलन और घरेलू महंगाई पर पड़ेगा। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या भारत यह बदलाव अंतरराष्ट्रीय दबाव में कर रहा है या यह कोई गहरी रणनीतिक शिफ्ट है जिसकी जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की गई है।

राहुल गांधी द्वारा साझा किए गए पुराने ट्वीट इस पूरे विवाद को और तीखा बना देते हैं। उन्होंने पहले कहा था कि ट्रम्प द्वारा लगाए गए “टैरिफ और प्रतिबंधों” के दबाव का भारत को सामना करना पड़ेगा और मोदी सरकार अंततः झुक जाएगी। राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया था कि ट्रम्प प्रशासन, रूस–भारत तेल सौदों और अडानी समूह के बीच “वित्तीय कनेक्शन उजागर करने” की धमकी दे रहा था। विजय थोट्टाथिल का दावा है कि आज हो रही घटनाएं—रिलायंस का कदम, सरकारी रिफाइनरियों द्वारा कमी, और भारत का भू-राजनीतिक झुकाव—राहुल गांधी के आरोपों को सही साबित करती हैं।

हालांकि केंद्र सरकार की ओर से अब तक इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन भाजपा समर्थकों का कहना है कि यह कदम वैश्विक बाज़ारों की स्थितियों और जी–7 कैप प्रतिबंधों से जुड़ा हुआ है, न कि किसी विदेशी दबाव से। दूसरी ओर, कांग्रेस इसे “राष्ट्रीय नीति पर बाहरी प्रभाव” का मामला बता रही है और कह रही है कि भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता को राजनीतिक सौदेबाज़ी में गिरवी रखा जा रहा है।

यह पूरा विवाद आगामी चुनावों से ठीक पहले नया राजनीतिक तूफान खड़ा कर सकता है। अगर भारत रूसी तेल से दूरी बनाता है, तो इसका आर्थिक और कूटनीतिक असर व्यापक होगा—और राजनीतिक असर उससे भी बड़ा। यह केवल तेल की बात नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक कथा की भी लड़ाई है जिसमें एक पक्ष दावा कर रहा है कि “मोदी विदेशी दबाव में झुकते हैं”, जबकि दूसरा पक्ष इसे “रणनीतिक पुनर्संतुलन” बता रहा है।

कहानी यहीं खत्म नहीं होती—अब निगाहें इस पर हैं कि क्या सरकार इस बदलाव का कोई औपचारिक कारण बताएगी, और क्या यह निर्णय अस्थायी है या स्थायी। फिलहाल इतना सुनिश्चित है कि राहुल गांधी के पुराने ट्वीट ने आज की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है—और इस बहस का असर सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित रहने वाला नहीं है।

 

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