अंतरराष्ट्रीय डेस्क 29 नवंबर 2025
श्रीलंका में साइक्लोन दित्वाह ने जिस स्तर की तबाही मचाई है, उसने द्वीप राष्ट्र को एक मानवीय संकट के केंद्र में ला खड़ा किया है। शनिवार को जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भीषण भूस्खलन और व्यापक बाढ़ के कारण अब तक 153 लोगों की जान जा चुकी है, 191 लोग लापता हैं और 5 लाख से अधिक नागरिक किसी न किसी रूप में आपदा से प्रभावित हुए हैं। लगातार हो रही बारिश और नदी-नालों के उफान ने कई इलाकों को जलमग्न कर दिया है, जहाँ घर पानी में डूब चुके हैं और सड़कें मानो समुद्र का हिस्सा बन गई हैं। मलवाना, कोलंबो और कैंडी सहित कई जिलों में भारी तबाही के दृश्य देखने को मिले—कहीं घर आधे पानी में डूबे हुए, तो कहीं लोग छतों पर चढ़कर बचाव का इंतजार करते दिखाई देते हैं। श्रीलंका सरकार ने हालात की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय आपातकाल (State of Emergency) घोषित कर दिया है, ताकि राहत कार्यों में गति लाई जा सके और सुरक्षा एजेंसियाँ बिना देरी कार्रवाई कर सकें।
आपदा प्रबंधन केंद्र (DMC) के अनुसार 78,000 से ज़्यादा लोगों को तत्काल निकासी कर लगभग 800 राहत शिविरों में ठहराया गया है, जिनमें अधिकांश स्कूलों को अस्थायी कैंप में बदल दिया गया है। लगातार हो रही बारिश राहत कार्यों में बड़ी बाधा बन रही है और कई इलाकों में पहुंचना अब भी मुश्किल है। राहत एजेंसियाँ नावों और हेलीकॉप्टरों की मदद से प्रभावित नागरिकों तक भोजन, पानी और दवाइयाँ पहुँचाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों में स्थिति अब भी गंभीर बनी हुई है।
इस बीच भारत ने पड़ोसी देश की इस नैसर्गिक त्रासदी में तत्काल मदद का हाथ बढ़ाया है। भारतीय वायुसेना के दो सैन्य परिवहन विमानों के माध्यम से 21 टन से अधिक राहत सामग्री—खाद्य पैकेट, दवाइयाँ, पानी, बिस्तर, तिरपाल और अन्य आवश्यक वस्तुएँ—शनिवार को कोलंबो भेजी गईं। यह सहायता उस पहले खेप के बाद भेजी गई है, जिसमें भारत ने एक दिन पहले 6 टन से ज्यादा जरूरी सामान श्रीलंका को प्रदान किया था। संकट की इस घड़ी में भारत का यह त्वरित मानवीय सहयोग न केवल दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों को मजबूत करता है, बल्कि एक बार फिर साबित करता है कि दक्षिण एशिया में मानवीय त्रासदियों के समय नई दिल्ली सबसे पहले सक्रिय होती है।
साइक्लोन दित्वाह ने न सिर्फ़ श्रीलंका की आधारभूत संरचनाओं को क्षतिग्रस्त किया है, बल्कि बाढ़ और भूस्खलन से हजारों घर उजड़ चुके हैं। कृषि भूमि डूब जाने से भविष्य में खाद्यान्न संकट की आशंका भी बढ़ गई है। बचाव दल मलबे में दबे लोगों की तलाश में दिन-रात जुटे हुए हैं, जबकि अस्पतालों में घायलों का दबाव तेजी से बढ़ रहा है। सरकार ने कहा है कि अगले 24 से 48 घंटे बेहद नाजुक हैं, क्योंकि मौसम विभाग ने अभी और बारिश की चेतावनी जारी की है।
दिनों-दिन बढ़ती मौतों, लापता लोगों की संख्या और व्यापक विनाश को देखते हुए यह स्पष्ट है कि श्रीलंका को इस आपदा से उबरने में लंबा समय लगेगा। राहत और पुनर्वास की प्रक्रिया विशाल होगी—और ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय समर्थन बेहद जरूरी। फिलहाल, मुल्क भर में एक ही चिंता छाई है: जिनकी जान बच गई है, वे कैसे जीएँगे—और जिनका सबकुछ बह गया, वे कहाँ लौटेंगे?




