ब्रुसेल्स, 28 अक्टूबर 2025
यूरोपीय संघ (EU) के विस्तार पर चल रही चर्चा इस साल फिर नई गति पकड़ चुकी है। यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद से यह प्रश्न सिर्फ तकनीकी या प्रशासनिक नहीं रहा, बल्कि सामरिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से भी गहराकर सामने आया है। हाल ही में प्रकाशित एक विशेष सर्वेक्षण ने यह दिखाया है कि लगभग 56 % यूरोपीय नागरिक अपने देश के लिए ईयू के विस्तार का समर्थन करते हैं।
इस समर्थन के पीछे कई कारण हैं। सर्वेक्षण में पाया गया कि जिन लोगों का समर्थन विस्तार में है, वे इसे अपने देश की वैश्विक पहचान, मजबूत बाज़ारों और रोजगार के अवसरों से जोड़ते हैं। उदाहरण के लिए, 37 % ने माना कि विस्तार से ‘ईयू का प्रभाव’ (“EU’s influence in the world”) बढ़ेगा और 37 % ने इकोनॉमिक मार्केट के विस्तार पर भरोसा जताया।
हालाँकि, यह समर्थन सर्वसम्मति नहीं है। विस्तारित होने की प्रक्रिया को लेकर नागरिकों में संदेह और घबराहट बनी हुई है। सर्वेक्षण के मुताबिक लगभग 40 % लोग “अनियंत्रित आव्रजन” (uncontrolled immigration) को विस्तार से होने वाला खतरा मानते हैं, 39 % भ्रष्टाचार व अपराध के बढ़ने की आशंका जताते हैं, तथा 37 % प्रतिपुष्टि करते हैं कि टैक्सदाताओं का बोझ बढ़ सकता है।
देश-देश में समर्थन में बहुत भिन्नता देखने को मिलती है। जैसे स्वीडन (79 %), डेनमार्क (75 %) तथा लिथुआनिया (74 %) में विस्तार का समर्थन काफी ऊँचा है। इसके विपरीत, फ्रांस (43 %), ऑस्ट्रिया (45 %) तथा चेक गणराज्य (43 %) में काफी कम समर्थन दर्ज हुआ है।
उम्र-समूह के हिसाब से आंकड़े अधिक दिलचस्प हैं: युवा (15-24 साल) वर्ग में समर्थन करीब 67 % तक है, जबकि 25-39 साल के समूह में यह 63 % है। इसका मतलब यह है कि आने वाले वर्षों में जनमानस में विस्तार-समर्थन बढ़ सकता है, लेकिन मौजूदा जनसंख्या में विरोध भी स्थिर है।
विश्लेषकों का कहना है कि विस्तार-नीति अब सिर्फ विस्तार नहीं रही — बल्कि यह ईयू की खुद की صلاح 和 策略 की कसौटी बन गई है। उदाहरणस्वरूप, ईयू ने अब तक पूर्वी यूरोप और पश्चिमी बाल्कन क्षेत्रों (Western Balkans) के देशों को सदस्यता की संभावना देते हुए कहा है कि उनका शामिल होना यूरोपीय सुरक्षा और समृद्धि को बढ़ाएगा। लेकिन इसके लिए ईयू के भीतर नियम-कानून (rule of law), अर्थव्यवस्था, भ्रष्टाचार-नियंत्रण और लोकतांत्रिक मानकों (Copenhagen criteria) को पूरी तरह अपनाना जरूरी है।
दूसरी ओर, विस्तार द्वारा ईयू के निर्णय-प्रक्रिया, बजट और संघ-सदस्य राज्यों के बीच संतुलन पर असर पड़ने की चिंता भी उठ रही है। कई अध्ययन बताते हैं कि नए सदस्यों के शामिल होने से वर्तमान सदस्यों की शक्ति-साझेदारी बदल सकती है, जिससे राजनीतिक मत-वर्चस्व और संसाधन वितरण में दबाव बढ़ सकता है।
समग्र रूप से यह कहा जा सकता है कि यूरोपीय नागरिकों के बीच ईयू के विस्तार को लेकर आशा और शंका दोनों हैं। जहाँ अधिकांश यह समझते हैं कि विस्तार से आर्थिक अवसर, वैश्विक प्रभाव और सहयोग बढ़ सकते हैं, वहीं वे यह भी चाहते हैं कि यह विस्तार नियमों, पारदर्शिता और प्रत्याशा के साथ हो। उदाहरणस्वरूप, 44 % ने कहा है कि सदस्यता की प्रक्रिया में कानून-शासन एवं भ्रष्टाचार-रोध पहल होनी चाहिए।
बहस अब इस पर केंद्रित है कि विस्तार “कब और कैसे” होगा — केवल संभावित उम्मीदवार देशों को स्वीकार कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी तैयारी, ईयू की आंतरिक व्यवस्था और राजनीतिक नेतृत्व की प्रतिबद्धता महत्वपूर्ण है। ईयू का विस्तार आज सिर्फ भू-राजनीतिक या आर्थिक प्रश्न नहीं रहा; यह यूरोप के नागरिकों के लिए पहचान, सुरक्षा और विकास का प्रश्न बन गया है। यदि विस्तार को सफल बनाना है तो न केवल उम्मीदवार देशों की बल्कि स्वयं ईयू की सुधार-यात्रा भी साथ तय करनी होगी।




