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उत्तर–पूर्व के चार राज्यों में BJP की फंडिंग पर गंभीर सवाल : चंदा दो ठेका लो, ‘कॉन्ट्रैक्टर–इकोनॉमी’ की पोल खोल

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एबीसी डेस्क 14 दिसंबर 2025

उत्तर–पूर्व भारत से BJP को मिलने वाले राजनीतिक चंदे को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। “द रिपोर्टर्स कलेक्टिव” की विस्तृत जांच ने चुनावी फंडिंग और सरकारी ठेकों के बीच गहरे रिश्ते की ओर इशारा किया है। यह जांच बताती है कि असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और त्रिपुरा से BJP को मिले चंदे का बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों और कंपनियों से आया है, जिन्हें उसी दौरान या उसके आसपास सरकारी ठेके, टेंडर या मंजूरियां मिलीं। आंकड़े चौंकाने वाले हैं। वित्त वर्ष 2022 से 2024 के बीच इन चार राज्यों से BJP को कुल ₹77.63 करोड़ का चंदा मिला। इसमें से ₹42.61 करोड़, यानी करीब 55 प्रतिशत, सरकारी काम पाने वाले दानदाताओं से आया। ये आंकड़े चुनाव आयोग को दिए गए आधिकारिक योगदान विवरणों के विश्लेषण पर आधारित हैं। तस्वीर साफ होती दिख रही है। उत्तर–पूर्व की राजनीति में सरकारी परियोजनाओं पर टिकी अर्थव्यवस्था और सत्ताधारी दल की फंडिंग एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी नजर आती है।

असम में यह पैटर्न सबसे ज्यादा साफ दिखाई देता है। साल 2023–24 में BJP को यहां जो चंदा मिला, उसका 52.34 प्रतिशत हिस्सा सरकारी ठेके हासिल करने वाली कंपनियों और व्यक्तियों से आया। इससे एक साल पहले यह आंकड़ा और भी ज्यादा था। तब करीब 64.48 प्रतिशत चंदा ऐसे ही दानदाताओं से मिला था। त्रिपुरा में स्थिति और गंभीर दिखती है। 2023–24 में यहां BJP को मिले चंदे का 61.7 प्रतिशत हिस्सा ठेकेदारों से आया। इससे पहले के साल में यह आंकड़ा 84 प्रतिशत से भी ऊपर था। अरुणाचल प्रदेश में भी आधे से अधिक चंदा सरकारी काम पाने वालों से जुड़ा पाया गया। मणिपुर में 2023 के बाद हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता के कारण बड़े चंदे घटे, लेकिन उससे पहले वहां भी यही रुझान दिखा। यानी समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं दिखती। यह पूरे क्षेत्र में फैला एक ढांचा नजर आता है।

रिपोर्ट में कई ठोस उदाहरण सामने रखे गए हैं। SPS कंस्ट्रक्शन, स्टार सीमेंट, बद्री राय एंड कंपनी जैसी कंपनियों का जिक्र किया गया है। बताया गया है कि कैसे इन कंपनियों ने बड़े सरकारी प्रोजेक्ट हासिल किए। और उसी समय या उसके आसपास BJP को करोड़ों रुपये का चंदा भी दिया। इन मामलों में कोई सीधा गैरकानूनी लेनदेन साबित नहीं किया गया है। खुद जांच भी यह साफ करती है कि यह सहसंबंध है, कारण नहीं। लेकिन सवाल फिर भी उठता है। क्या सरकारी ठेकों पर निर्भर कंपनियों से बड़े पैमाने पर मिलने वाला चंदा लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ कहा जा सकता है। क्या यह व्यवस्था जनता के भरोसे को कमजोर नहीं करती।

विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तर–पूर्व की अर्थव्यवस्था निजी पूंजी पर कम और सरकारी परियोजनाओं पर ज्यादा निर्भर है। यहां सड़क, पुल, भवन, खनन और दूसरी बड़ी योजनाएं ही कारोबार का मुख्य आधार हैं। ऐसे में सत्ता में बैठी पार्टी को स्वाभाविक बढ़त मिल जाती है। ठेके सरकार के पास होते हैं। मंजूरियां सरकार के हाथ में होती हैं। और चंदा भी अक्सर सत्ता के आसपास ही पहुंचता है। यह स्थिति सत्ताधारी दल को असाधारण राजनीतिक लाभ देती है। यही वजह है कि इस पूरे ढांचे को ‘कॉन्ट्रैक्टर–इकोनॉमी’ कहा जा रहा है।

हालांकि कानून के लिहाज से इन चंदों को वैध बताया जाता है। चुनावी कानून इसकी इजाजत देते हैं। लेकिन नैतिक सवाल अपनी जगह कायम रहते हैं। क्या लोकतंत्र केवल कानून की सीमाओं तक सिमटकर रह सकता है। या फिर उससे आगे जाकर जवाबदेही और पारदर्शिता की भी जरूरत होती है। इस जांच ने एक बार फिर चुनावी फंडिंग, क्रोनी कैपिटलिज़्म और सत्ता–व्यवसाय गठजोड़ पर राष्ट्रीय बहस को तेज कर दिया है। सवाल साफ है। जब आधे से ज्यादा चंदा ठेकेदारों से आए, तो लोकतंत्र में आम वोटर की भूमिका आखिर कितनी मजबूत रह जाती है।

साभार : द कलेक्टिव रिपोर्ट्स। पूरी खबर के लिए देख सकते हैं
https://www.reporters-collective.in/trc/more-than-half-of-bjps-funds-in-northeast-from-those-who-won-govt-contracts

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