अनिल यादव। अयोध्या 26 नवंबर 2025
अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा केसरिया झंडा फहराने का दृश्य पूरे देश में गहरी राजनीतिक और संवैधानिक बहस खड़ा कर गया है। यह महज कोई धार्मिक कार्यक्रम या सांस्कृतिक आयोजन नहीं था, एक ऐसा राजनीतिक संदेश था, जिसने भारत के लोकतांत्रिक ढांचे और संविधान की मूल भावना पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में साफ कहा था कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस एक “अपराध” था—भारत के इतिहास में दर्ज एक ऐसा काला अध्याय, जिसमें भीड़ ने एक धार्मिक स्थल को गिराया और राज्य व्यवस्था इसे रोकने में नाकाम रही। लेकिन जिस स्थान को अदालत ने ‘अपराध का स्थल’ माना, उसी जगह पर आज देश का प्रधानमंत्री खड़े होकर केसरिया झंडा फहराता है और उसे “भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण” का प्रतीक बताता है। यह दृश्य सिर्फ इतिहास को बदलकर पेश करने की कोशिश नहीं, बल्कि संविधान में लिखे गए उन सिद्धांतों की खुली अनदेखी भी है, जो भारत को एक बहुलतावादी और समावेशी देश बनाते हैं। भारत के प्रधानमंत्री का यह कदम सत्ता के उस झुकाव को दिखाता है, जहां राष्ट्र की पहचान को एक ही रंग, एक ही विचार और एक ही धार्मिक प्रतीक में बांधने की कोशिश लगातार तेज हो गई है।
भारत जैसे विविध और विशाल देश की आत्मा उसकी बहुलता में है—यहां हर धर्म, हर संस्कृति और हर भाषा मिलकर “भारत” बनाते हैं। लेकिन अयोध्या में फहराए गए केसरिया झंडे का राजनीतिक अर्थ यही दिखता है कि सत्ता अब एक रंग को राष्ट्रवाद का आधिकारिक प्रतीक बनाने पर तुली है, जैसे भारत की पहचान किसी एक विचारधारा की मोहताज हो। यह सोच खतरनाक है, क्योंकि इससे भारत की उस लोकतांत्रिक नींव को नुकसान पहुंचता है, जो सभी को बराबरी का अधिकार देती है। यह कदम साफ संकेत देता है कि सत्ता “धर्मनिरपेक्ष भारत” की जगह “एकरूप भारत” बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है—ऐसा भारत जहां संविधान से ऊपर किसी विचारधारा का झंडा रखा जा रहा है। विशेषज्ञ इसे संविधान से विचलन और भारतीय गणराज्य के चरित्र को कमजोर करने वाली प्रक्रिया बताते हैं, जिसमें भारत की विविधता को धीरे-धीरे किनारे लगाया जा रहा है और बहुसंख्यकवाद को राष्ट्रवाद का नया चेहरा बनाया जा रहा है।
और सबसे महत्वपूर्ण सत्य यही है कि भारत का असली ध्वज सिर्फ तिरंगा है। वही तिरंगा जिसके नीचे स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष किया, जिसके नीचे करोड़ों भारतीयों ने एकता, समानता और आज़ादी का सपना देखा। तिरंगे की केसरिया पट्टी वीरता और त्याग की है, पर पूरा झंडा कभी किसी एक रंग या किसी एक धर्म की संपत्ति नहीं रहा। तिरंगे का सफेद रंग शांति और सत्य का संदेश देता है और हरा रंग समृद्धि के सपनों का प्रतिनिधित्व करता है। बीच का अशोक चक्र भारत के कानून और न्याय की सर्वोच्चता का प्रतीक है। ऐसे में जब किसी अन्य धर्म-विशेष के झंडे को “भारत की पहचान” के रूप में पेश किया जाता है, तो यह तिरंगे की आत्मा को हल्का करने जैसा है, जो भारत के संवैधानिक लोकतंत्र की मूल जड़ को कमजोर करता है। तिरंगा हमें जोड़ता है, जबकि एक धार्मिक झंडा हमें बांटता है—और यही फर्क आज सबसे शक्तिशाली होकर दिखाई दे रहा है।
अब सवाल यह है कि क्या भारत उस दिशा में जा रहा है जहां राष्ट्रीय पहचान किसी विचारधारा के रंग से तय होगी? क्या वह भारत, जिसे संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर खड़ा किया था, धीरे-धीरे एक अलग रास्ते पर धकेला जा रहा है? अयोध्या में केसरिया झंडे का फहराया जाना सिर्फ एक प्रतीकात्मक घटना नहीं, बल्कि एक बड़ी वैचारिक घोषणा है कि सत्ता अब तिरंगे से आगे बढ़कर एक नए “राष्ट्रवाद” की परिभाषा लिखना चाहती है। यह लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत है, क्योंकि जो राष्ट्र अपनी विविधता, अपने इतिहास और अपने संविधान से ऊपर किसी विचारधारा के झंडे को रखने लगता है, वह अपनी असली पहचान खो देता है। इसलिए यह क्षण सिर्फ अयोध्या का नहीं, भारत के भविष्य का है—और उस भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए तिरंगे का सम्मान बनाए रखना हर भारतीय का कर्तव्य है।





