महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 30 नवंबर 2025
दिल्ली के करोलबाग क्षेत्र को लेकर एक गंभीर राजनीतिक विवाद उठ खड़ा हुआ है, जहाँ सोशल मीडिया पर यह आरोप वायरल है कि एक कथित 1400 वर्ष पुराना हिंदू मंदिर ध्वस्त किया गया और इसका उद्देश्य कथित रूप से RSS मुख्यालय के पास पार्किंग क्षेत्र का विस्तार बताया जा रहा है। हालांकि अब तक इस दावे की किसी भी आधिकारिक स्रोत या प्रमुख समाचार संस्थान ने पुष्टि नहीं की है, लेकिन आरोपों ने राजधानी में राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। विपक्षी दल और कई सामाजिक समूह इसे ‘हिंदू विरासत पर सीधा हमला’ बताते हुए सरकार और RSS पर सवाल उठा रहे हैं।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब कुछ स्थानीय पेजों और सोशल मीडिया खातों ने वीडियो और तस्वीरें साझा करते हुए दावा किया कि “दिल्ली में एक प्राचीन मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया है” और इसके पीछे संघ कार्यालय के निकट पार्किंग विस्तार को वजह बताया। इन पोस्टों ने कुछ ही घंटों में इंटरनेट पर तेजी से प्रसार पाया। वहीं, दिल्ली नगर निगम (MCD) और संबंधित सरकारी एजेंसियों ने अब तक ऐसे किसी ‘1400 साल पुराने मंदिर’ के अस्तित्व या उसकी ध्वस्ति पर स्पष्ट आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, करोलबाग क्षेत्र में हाल ही में चलाए गए ‘अवैध निर्माण हटाओ अभियान’ के दौरान कई अस्थायी और जोखिमपूर्ण संरचनाओं को हटाया गया था, लेकिन उनमें किसी प्राचीन संरक्षित मंदिर के ध्वस्त किए जाने की पुष्टि मीडिया रिपोर्टों में नहीं मिलती।
फिर भी, राजनीतिक मोर्चे पर मामला तेजी से गरमाता दिख रहा है। आलोचकों का कहना है कि अगर यह आरोप सही है तो यह न केवल धार्मिक धरोहरों के संरक्षण पर चोट है बल्कि यह इस बात का उदाहरण है कि राजनीतिक और संस्थागत हितों के लिए सांस्कृतिक स्थलों की अनदेखी की जा रही है। विपक्ष का आरोप है कि “मोदी सरकार और BJP के लिए हिंदू धर्म सिर्फ चुनावी नारों का विषय है, लेकिन वास्तविक संरक्षण की बात आती है तो यह सरकार चुप्पी साध लेती है।” कई नेताओं ने RSS पर भी निशाना साधा है, यह कहते हुए कि “वह अपने विस्तार के लिए धार्मिक स्थलों की भी परवाह नहीं करती।” हालांकि RSS की ओर से भी इस दावे पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वाकई किसी संरक्षित या ऐतिहासिक मंदिर को ध्वस्त किया गया है, तो ASI, MCD और राज्य पुरातत्व विभाग के रिकॉर्ड में उसके स्पष्ट साक्ष्य मिलेंगे, और किसी भी ऐतिहासिक स्थल पर कार्रवाई बिना अधिसूचना के संभव नहीं। इसलिए, इस पूरे विवाद की वास्तविकता तभी स्पष्ट होगी जब संबंधित एजेंसियाँ तथ्य सार्वजनिक करें और यह जांच हो कि सोशल मीडिया पर फैल रहे दावों में कितनी सच्चाई है।
मौजूदा स्थिति में मामला आरोपों बनाम तथ्यों के बीच उलझा हुआ है—लेकिन यह स्पष्ट है कि इसने राजधानी की राजनीति, धार्मिक भावनाओं और सांस्कृतिक विरासत संरक्षण पर नई बहस छेड़ दी है। अब सबकी नज़र सरकारी एजेंसियों के आधिकारिक बयान पर है, जो इस विवाद की सच्चाई को सामने लाएगा।





