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राम मंदिर ध्वजारोहण विवाद: कांग्रेस सांसद का आरोप—अवधेश प्रसाद को दलित होने की वजह से नहीं बुलाया गया

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अनिल यादव। लखनऊ 26 नवंबर 2025

राम मंदिर के ध्वजारोहण समारोह को लेकर एक नया राजनीतिक विवाद तब खड़ा हो गया जब कांग्रेस के दलित सांसद इमरान मसूद ने आरोप लगाया कि अयोध्या के विधायक और वरिष्ठ नेता अवधेश प्रसाद को कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया गया, और इसका कारण उनका दलित होना है। इमरान मसूद के इस बयान ने न केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि राम मंदिर आयोजन की चयन प्रक्रिया, सामाजिक समावेशिता और राजनीतिक भेदभाव को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। मसूद ने कहा कि अवधेश प्रसाद को आमंत्रित न करना केवल एक “चूक” या “दुर्भाग्य” नहीं, बल्कि एक सोचा–समझा कदम है जो यह दिखाता है कि समाज के सबसे पिछड़े वर्ग तक आज भी समान सम्मान नहीं पहुँच रहा।

इमरान मसूद ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि अवधेश प्रसाद सिर्फ किसी सामान्य कार्यकर्ता या छोटे नेता का नाम नहीं हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश का एक सम्मानित, अनुभवी और सात बार के विधायक रहने वाला चेहरा हैं, जिन्होंने अयोध्या के सामाजिक–राजनीतिक ताने–बाने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि जब ऐसे वरिष्ठ नेता, जो दलित समुदाय से आते हैं, को इस तरह के ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रम से बाहर रखा जाता है, तो यह साफ संकेत है कि भेदभाव अभी भी सत्ता के गलियारों में गहराई से मौजूद है। मसूद के शब्दों में, “अगर अवधेश प्रसाद दलित न होते तो क्या उन्हें बुलाया जाता? यह सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का है।”

कांग्रेस सांसद ने यह भी कहा कि राम मंदिर केवल किसी एक दल या विचारधारा का प्रतीक नहीं है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत, आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक है। ऐसे में ध्वजारोहण जैसा आयोजन किसी विशेष वर्ग, पार्टी या समूह का निजी कार्यक्रम नहीं हो सकता। मसूद ने आरोप लगाया कि आमंत्रण सूची तैयार करते समय राजनीतिक अनुकूलता और सामाजिक श्रेणी को महत्व दिया गया, न कि समाज के वास्तविक प्रतिनिधित्व को। उन्होंने कहा कि दलित समुदाय को केवल प्रतीकों, नारों और घोषणाओं में शामिल करना काफी नहीं है—उन्हें सम्मान और सहभागिता वास्तविक और बराबर रूप से मिलनी चाहिए।

इमरान मसूद के आरोपों पर विपक्ष ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह घटना साबित करती है कि दलित नेताओं को राष्ट्रीय–सांस्कृतिक कार्यक्रमों से बाहर रखने की प्रवृत्ति अभी भी जारी है। विपक्षी दलों ने सवाल उठाए कि जब आयोजन में देशभर के नेताओं, संतों, कलाकारों और अधिकारियों को बुलाया जा सकता है, तो अयोध्या के एक दलित, वरिष्ठ और लोकप्रिय विधायक को क्यों नहीं? क्या यह केवल संयोग है, या सामाजिक पूर्वाग्रह का प्रतिबिंब?

वहीं, सत्तारूढ़ पक्ष की ओर से स्पष्टीकरण की मांग की जा रही है, लेकिन अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सामाजिक संगठनों और दलित अधिकार समूहों ने भी इस घटना को “गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण” बताते हुए सवाल उठाए हैं कि आखिर कब तक दलित प्रतिनिधियों को ऐसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजनों से बाहर रखा जाएगा?

राम मंदिर का ध्वजारोहण समारोह भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण क्षण माना जा रहा था, लेकिन अवधेश प्रसाद को आमंत्रण न भेजने और इमरान मसूद के आरोपों ने इसे राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। यह विवाद केवल एक आमंत्रण का मुद्दा नहीं, बल्कि दलित सम्मान, सामाजिक न्याय और राजनीतिक योग्यता बनाम सामाजिक पहचान के बीच जारी संघर्ष का प्रतीक बन गया है।

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