राहुल गांधी का बयान — “आप नरेंद्र मोदी से कहिए कि नाचकर दिखाइए, तो वो नाचेंगे” — अब केवल व्यंग्य नहीं रहा, बल्कि एक राजनीतिक यथार्थ बन गया है। बिहार चुनाव के ठीक पहले जिस तरह केंद्र सरकार और पूरी बीजेपी अचानक ‘छठ पूजा’ के रंग में डूब गई है, उसने राहुल गांधी के इस तंज को पूर्णतः सही साबित कर दिया है। सत्ता का पूरा तंत्र मानो चुनावी मंच पर प्रदर्शन कर रहा हो, और यह प्रदर्शन आस्था का नहीं बल्कि राजनीति का है।
तथ्यों को देखें — देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, जो जुलाई 2022 से देश की सर्वोच्च संवैधानिक पद पर हैं, अब तक किसी भी धार्मिक आयोजन में इस तरह सार्वजनिक रूप से शामिल नहीं हुई थीं। लेकिन इस बार राष्ट्रपति भवन में छठ पूजा का विशेष आयोजन किया गया, उसकी तस्वीरें और वीडियो सरकारी चैनलों और सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर प्रसारित किए गए। सवाल उठता है — क्या यह अचानक धार्मिक सम्मान की भावना है, या बिहार के मतदाताओं को भावनात्मक रूप से प्रभावित करने का सुनियोजित प्रयास?
इसी तरह दिल्ली की मेयर रेखा गुप्ता, जो हरियाणा मूल की हैं और अब तक किसी सांस्कृतिक या धार्मिक आयोजन से नहीं जुड़ी थीं, इस बार कपिल मिश्रा और मनोज तिवारी के साथ मिलकर छठ के घाट पर पूजा करती दिखाई दीं। रेखा गुप्ता, मनोज तिवारी और कपिल मिश्रा की एक साथ तस्वीरें वायरल हुईं — और यह सब ठीक उसी समय जब बिहार चुनाव का प्रचार अपने चरम पर है। हरियाणा और दिल्ली में छठ पूजा के इस अचानक “राजनीतिक जागरण” ने एक ही संदेश दिया — बीजेपी अब बिहार की संस्कृति को चुनावी मंच पर भुनाने की पूरी तैयारी में है।
छठ बिहार का प्रमुख पर्व है — सूर्य उपासना का यह पर्व बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड की पहचान है। यह पर्व भक्ति, तपस्या और पवित्रता का प्रतीक है। लेकिन इस बार जिस तरह दिल्ली, हरियाणा, झारखंड और यहां तक कि राष्ट्रपति भवन तक इसे “राष्ट्रीय उत्सव” की तरह प्रचारित किया जा रहा है, वह किसी धार्मिक विस्तार की निशानी नहीं बल्कि एक राजनीतिक प्रचार रणनीति का हिस्सा लगता है।
राहुल गांधी ने अपने बयान में जो कहा था — “मोदी वोट के लिए कुछ भी करेंगे, कहिए तो नाचकर दिखा देंगे” — वह आज देश की राजनीति में हूबहू घटित हो रहा है। प्रधानमंत्री की टीम, उनके मंत्री और समर्थक नेता एक के बाद एक बिहार से जुड़ी परंपराओं में दिख रहे हैं। यह सब संयोग नहीं है, बल्कि सोची-समझी रणनीति है, ताकि बिहार की आस्था को वोट में बदला जा सके।
कहने को तो बीजेपी इसे “सांस्कृतिक सम्मान” का नाम दे रही है, लेकिन असल में यह चुनावी अभिनय है। जिस तरह हर मंच पर ‘छठ’ की आड़ में राजनीतिक चेहरों की मौजूदगी बढ़ी है, उससे साफ है कि सत्ता ने आस्था को प्रचार का हथियार बना लिया है। जब राष्ट्रपति से लेकर पार्षद तक एक ही सांस्कृतिक फ्रेम में फिट किए जाएं, तो समझिए कि चुनावी इंजीनियरिंग कितनी गहराई तक पहुंच चुकी है।
राहुल गांधी का व्यंग्य अब सिर्फ व्यंग्य नहीं रहा — वह सटीक राजनीतिक भविष्यवाणी साबित हुआ है। उन्होंने जो कहा था, वह आज हर दृश्य में नज़र आ रहा है — सत्ताधारी दल वाकई नाच रहा है, लेकिन न तो संस्कृति के लिए, न ही परंपरा के लिए; बल्कि बिहार के वोटों की धुन पर।
और यही वजह है कि यह हेडलाइन सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि एक सच्चाई बन चुकी है —
“राहुल गांधी का तंज सच साबित: बिहार चुनाव के लिए ‘छठ राजनीति’ में झूमी बीजेपी।”




