एबीसी नेशनल न्यूज | 5 फरवरी 2026
नई दिल्ली। लोकसभा में बोलने का अवसर न मिलने पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। अपने पत्र में राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर जानबूझकर सदन में अपनी बात रखने से रोका गया। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक परंपराओं और संसदीय मर्यादाओं के खिलाफ बताते हुए गंभीर आपत्ति जताई है।
राहुल गांधी ने पत्र में लिखा कि नेता प्रतिपक्ष की भूमिका केवल औपचारिक या प्रतीकात्मक नहीं होती, बल्कि वह करोड़ों नागरिकों की चिंताओं, सवालों और अपेक्षाओं को संसद के पटल पर रखने की संवैधानिक जिम्मेदारी निभाता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर चर्चा के दौरान विपक्ष की आवाज़ को दबाना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि इससे संसद एकतरफा मंच बनकर रह जाती है। उनके अनुसार, यह स्थिति लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध है।
अपने पत्र में राहुल गांधी ने यह भी उल्लेख किया कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की बहस के दौरान उन्हें बोलने का अवसर नहीं दिया गया, जबकि यह लंबे समय से चली आ रही संसदीय परंपरा रही है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों को अपनी बात रखने का पूरा और समान अवसर मिले। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि विपक्ष को व्यवस्थित ढंग से बोलने से रोका जाएगा, तो संसद में सार्थक बहस, जवाबदेही और लोकतांत्रिक निगरानी की प्रक्रिया कमजोर होती चली जाएगी।
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसे लोकतंत्र पर सीधा हमला करार देते हुए कहा है कि सदन में संवाद की जगह टकराव को बढ़ावा दिया जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि असहमति की आवाज़ को दबाने की कोशिशें संसदीय लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाती हैं। वहीं, सत्ता पक्ष का कहना है कि सदन की कार्यवाही निर्धारित नियमों और समय-सीमा के तहत चलाई जाती है और विपक्ष जानबूझकर राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी द्वारा लिखा गया यह पत्र केवल एक औपचारिक विरोध नहीं है, बल्कि यह संसद में विपक्ष की भूमिका, अधिकारों और मर्यादाओं को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा करता है। उनका कहना है कि यदि संवाद की जगह टकराव हावी होता गया, तो इसका असर न केवल संसद की कार्यप्रणाली पर पड़ेगा, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी गहरे सवाल खड़े होंगे। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक बहस का अहम केंद्र बना रह सकता है।




