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उन्नाव पीड़िता से राहुल गांधी की मुलाक़ात: सुप्रीम कोर्ट की लड़ाई, सुरक्षा और रोज़गार पर सहयोग का भरोसा

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महेंद्र कुमार | नई दिल्ली | 24 दिसंबर 2025

बलात्कारियों को ज़मानत, पीड़िताओं से अपराधियों सा व्यवहार—ये कैसा न्याय? : राहुल गांधी

उन्नाव गैंगरेप मामले की पीड़िता ने बुधवार को कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की। यह मुलाकात सिर्फ एक राजनीतिक शिष्टाचार नहीं थी, बल्कि उस पीड़ा, डर और टूटे भरोसे की गवाही थी, जिसे एक पीड़िता आठ साल बाद भी अपने भीतर ढो रही है। दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दोषी करार दिए गए पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सशर्त ज़मानत दिए जाने के आदेश के बाद पीड़िता और उसके परिवार का डर फिर सतह पर आ गया है—और इसी के विरोध में उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व से न्याय की गुहार लगाई।

सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने पीड़िता और उसके परिवार की बात गंभीरता से सुनी और भरोसा दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट में मज़बूत कानूनी लड़ाई और उनकी सुरक्षा के लिए कांग्रेस उनके साथ खड़ी रहेगी। परिवार ने साफ कहा कि उन्हें सिर्फ काग़ज़ों पर लिखी शर्तें नहीं चाहिएं, बल्कि ज़मीन पर दिखने वाली वास्तविक सुरक्षा, सम्मान और भयमुक्त जीवन चाहिए—ताकि न्याय केवल फैसलों तक सीमित न रहे, बल्कि उनकी ज़िंदगी में भी महसूस हो।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के सामने पीड़िता और उसके परिवार ने तीन अहम मांगें रखीं। पहली—सुप्रीम कोर्ट में कुलदीप सेंगर के खिलाफ मुक़दमा लड़ने के लिए किसी वरिष्ठ और सक्षम वकील की व्यवस्था। राहुल गांधी ने इस पर पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया। दूसरी—जान का खतरा बताते हुए परिवार ने कांग्रेस शासित किसी राज्य में स्थानांतरण की मांग रखी, ताकि वे बिना डर के जी सकें। राहुल गांधी ने इस मांग पर भी मदद का भरोसा दिलाया। तीसरी—पीड़िता के पति ने स्थायी और सम्मानजनक रोज़गार की मांग रखी, जिस पर राहुल गांधी ने गंभीरता से विचार करने की बात कही।

इस मुलाकात में सोनिया गांधी की मौजूदगी ने पीड़िता को भावनात्मक संबल दिया। दोनों नेताओं ने एक स्वर में कहा कि न्याय और सुरक्षा के लिए वे अपनी पूरी क्षमता से प्रयास करेंगे और पीड़िता को अकेला नहीं छोड़ा जाएगा।

इसी पृष्ठभूमि में राहुल गांधी की प्रतिक्रिया बेहद तीखी और भावनात्मक रही। उन्होंने सवाल उठाया— “बलात्कारियों को ज़मानत और पीड़िताओं के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार—ये कैसा न्याय है?” उनका कहना था कि यह सिर्फ एक कानूनी या राजनीतिक मामला नहीं, बल्कि समाज और न्याय व्यवस्था की नैतिक हार है। राहुल गांधी के शब्दों में, “हम एक मृत समाज भी बनते जा रहे हैं,” जहां न्याय मांगने वालों को दबाया जा रहा है और ताक़तवर अपराधियों के लिए रास्ते खुले छोड़े जा रहे हैं।

पीड़िता ने खुद अपने दर्द को शब्दों में यूं बयां किया—
“उन्होंने हमें भरोसा दिलाया कि न्याय दिलाने में मदद करेंगे। देश में यह पहली बार है जब बलात्कार का दोषी ज़मानत पर रिहा होने की राह में है। मैं प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से मिलने का समय चाहती हूं। राहुल गांधी ने हमें बहुत हिम्मत दी है और भरोसा दिलाया है कि हमें न्याय मिलेगा… यह आदेश देश की बेटियों को कमज़ोर करता है।”
ये शब्द उस पीड़ा का बयान हैं, जिसमें डर भी है, गुस्सा भी—और फिर भी कहीं न कहीं इंसाफ़ की उम्मीद बाकी है।

उन्नाव रेप केस एक बार फिर देश की अंतरात्मा को झकझोर रहा है। यह महज़ एक अदालती आदेश नहीं, बल्कि उस न्याय व्यवस्था पर गहरा सवाल है, जो आठ साल बाद भी एक नाबालिग गैंगरेप पीड़िता को भयमुक्त जीवन नहीं दे पाई। 2017 की उस दिल दहला देने वाली घटना में दोषी ठहराए गए कुलदीप सिंह सेंगर को 23 दिसंबर 2025 को सजा निलंबन और सशर्त ज़मानत दिए जाने का आदेश—उसी “न्याय” का कठोर आईना है, जिसे राहुल गांधी अमानवीय और पीड़िता-विरोधी बता रहे हैं।

काग़ज़ों में यह फैसला भले “कानूनी प्रक्रिया” हो, लेकिन ज़मीन पर इसका असर पीड़िता और उसके परिवार के लिए डर की वापसी जैसा है। अदालत ने कड़ी शर्तें ज़रूर लगाईं—पीड़िता के घर से पाँच किलोमीटर दूर रहना, किसी तरह की धमकी या संपर्क न करना, दिल्ली में ही रहना—लेकिन सवाल वही है: क्या शर्तें लिख देने से सालों का डर मिट जाता है? क्या इंसाफ़ सिर्फ आदेशों से ज़िंदा रहता है?

सेंगर फिलहाल जेल से बाहर नहीं आएंगे, क्योंकि पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत के मामले में उन्हें दस साल की सजा मिल चुकी है। फिर भी, सजा का निलंबन अपने आप में एक खतरनाक संकेत देता है—कि ताक़तवर अपराधियों के लिए कानून के दरवाज़े कभी पूरी तरह बंद नहीं होते।

इस फैसले के बाद पीड़िता का दर्द और गहरा हो गया है। परिवार का कहना है कि यह आदेश उनके लिए “काल” जैसा है। बहन की आवाज़ में डर साफ झलकता है—“हम फिर उसी साये में जीने को मजबूर होंगे।” यह वही परिवार है जिसने धमकियां झेलीं, पिता को खोया, मां और बेटियों ने अपमान सहा—और फिर भी न्याय की उम्मीद नहीं छोड़ी।

इसी बीच, इंडिया गेट पर पीड़िता, उसकी मां और सामाजिक कार्यकर्ताओं के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिसिया सख्ती के दृश्य सामने आए। वायरल वीडियो में पीड़िता की मां को बस से उतारते समय धक्का दिए जाने की तस्वीरें कई सवाल छोड़ जाती हैं—क्या लोकतंत्र में न्याय मांगना अब अपराध बनता जा रहा है?

उन्नाव रेप केस अब सिर्फ एक अदालत की फाइल नहीं रहा। यह महिलाओं की सुरक्षा, न्याय प्रणाली की संवेदनशीलता और सत्ता–कानून के रिश्ते की कड़ी परीक्षा बन चुका है। आठ साल बाद भी अगर एक पीड़िता डर में जी रही है, तो यह हार सिर्फ उसकी नहीं—पूरे सिस्टम की है। निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं। सवाल वही है, जो आज पूरा देश पूछ रहा है—क्या वहां सिर्फ कानून बोलेगा, या सच में इंसाफ़ भी सुनाई देगा?

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