एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 15 फरवरी 2026
सोशल मीडिया पर सनसनी: ‘खजाने से सोना गायब’ का दावा
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गोल्ड रिजर्व को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया पर एक सनसनीखेज दावा तेजी से वायरल हो रहा है। कुछ पोस्ट्स और वेबसाइटों में यह कहा जा रहा है कि देश के खजाने से 1.28 लाख करोड़ रुपये का सोना “गायब” हो गया है। इन दावों के साथ वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से जवाब मांगा जा रहा है और देश की आर्थिक साख पर सवाल उठाए जा रहे हैं। कई जगह यह तक कहा जा रहा है कि यह सोना “चुपके से स्विस बैंकों में जमा” करा दिया गया हो सकता है। इन दावों ने आम लोगों के बीच भ्रम और चिंता की स्थिति पैदा कर दी है।
RBI के आंकड़े क्या कहते हैं? मूल्य बनाम मात्रा का फर्क
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि इस पूरे विवाद को समझने के लिए “सोने के मूल्य” और “सोने की भौतिक मात्रा” के बीच का अंतर समझना जरूरी है। RBI नियमित रूप से अपने विदेशी मुद्रा भंडार और गोल्ड रिजर्व के आंकड़े जारी करता है। इन आंकड़ों में सोने की मात्रा टन में और उसका मूल्य डॉलर या रुपये में दर्शाया जाता है। चूंकि सोने की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में रोज बदलती रहती है और डॉलर-रुपया विनिमय दर भी उतार-चढ़ाव का सामना करती है, इसलिए रिजर्व के कुल मूल्य में अंतर दिख सकता है। इसका यह अर्थ नहीं कि भौतिक सोना कम हो गया है। यदि कीमत घटती है तो कुल मूल्य कम दिखाई देगा, जबकि मात्रा वही रह सकती है।
‘स्विस बैंक’ का एंगल: सच्चाई या अटकल?
वायरल दावों में यह भी कहा जा रहा है कि सोना किसी विदेशी बैंक—खासकर स्विस बैंक—में ट्रांसफर कर दिया गया है। जानकारों के मुताबिक, दुनिया के कई केंद्रीय बैंक अपने गोल्ड रिजर्व का एक हिस्सा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्रों, जैसे बैंक ऑफ इंग्लैंड या अन्य सुरक्षित भंडारण स्थानों में रखते हैं। यह प्रचलित और वैध व्यवस्था है, ताकि जरूरत पड़ने पर सोने को अंतरराष्ट्रीय बाजार में आसानी से इस्तेमाल किया जा सके। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सोना किसी निजी खाते में चला गया हो। अब तक किसी आधिकारिक दस्तावेज, जांच रिपोर्ट या सरकारी बयान में ऐसा कोई आरोप पुष्ट नहीं हुआ है कि भारत का सोना किसी निजी खाते में जमा कराया गया हो।
आर्थिक साख और पारदर्शिता का सवाल
हालांकि विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक समूहों का कहना है कि सरकार को इस मामले में स्पष्ट बयान जारी करना चाहिए, ताकि किसी भी तरह का भ्रम दूर हो सके। उनका तर्क है कि विदेशी मुद्रा भंडार और गोल्ड रिजर्व जैसे संवेदनशील मुद्दों पर पारदर्शिता बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे देश की आर्थिक साख जुड़ी होती है। यदि आंकड़ों में गिरावट दिखती है तो उसका कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए, ताकि अफवाहों को बढ़ावा न मिले।
विशेषज्ञों की सलाह: आंकड़ों को संदर्भ में समझें
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि किसी भी आर्थिक डेटा को संदर्भ से अलग करके देखने से भ्रम पैदा हो सकता है। रिजर्व का मूल्य घटने का मतलब हमेशा संपत्ति का गायब होना नहीं होता। वैश्विक बाजार में सोने की कीमत, केंद्रीय बैंकों की खरीद-बिक्री नीति, विनिमय दर और लेखांकन पद्धति—इन सभी कारकों का असर आंकड़ों पर पड़ता है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक रिपोर्ट और विस्तृत विश्लेषण देखना जरूरी है।
सवाल बड़े हैं, पर सबूत जरूरी
“1.28 लाख करोड़ का सोना गायब” जैसे दावे निश्चित रूप से गंभीर हैं और यदि इनमें सच्चाई हो तो यह राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन सकता है। लेकिन फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों में भौतिक सोने के गायब होने की पुष्टि नहीं है। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि अफवाहों और सनसनी से बचते हुए प्रमाणित जानकारी पर भरोसा करना चाहिए। सरकार की ओर से स्पष्ट और विस्तृत स्पष्टीकरण आने पर ही इस विवाद की पूरी तस्वीर साफ हो पाएगी।




