अजित कुमार । वॉशिंगटन 12 दिसंबर 2025
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़ा भूचाल लाते हुए अमेरिकी कांग्रेस में एक ऐसा बिल पेश किया गया है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। यह बिल अमेरिका को नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (NATO) से पूरी तरह निकालने की मांग करता है। बिल पेश करने वाले सांसद का दावा है कि अमेरिका इस सैन्य गठबंधन पर अनगिनत ट्रिलियन डॉलर खर्च कर चुका है, जिसकी कोई प्रत्यक्ष वापसी नहीं हुई। उनका कहना है कि अमेरिका की जनता भारी टैक्स भरती है, जबकि NATO सहयोगी देश अपनी सुरक्षा जिम्मेदारियों को अमेरिका के कंधों पर डालकर आराम से बैठ जाते हैं।
इस बिल के सामने आने के बाद अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में गहमागहमी तेज हो गई है। समर्थक सांसदों का तर्क है कि NATO अपनी मूल भूमिका से भटक गया है। वे कहते हैं कि गठबंधन अब अमेरिकी हितों की सेवा करने के बजाय यूरोपीय देशों के बोझ को ढोने वाला संगठन बन गया है। उनका दावा है कि यदि अमेरिका NATO से बाहर निकलता है, तो उसे भारी-भरकम सैन्य बजट में कटौती करने का मौका मिलेगा और देश के संसाधन घरेलू जरूरतों—जैसे हेल्थकेयर, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर—पर खर्च किए जा सकेंगे। इससे अमेरिकी जनता को सीधा फायदा पहुंचेगा।
हालांकि इस बिल का विरोध भी उतना ही तीखा है। बड़े तबके का कहना है कि NATO से हटना अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व क्षमता को कमजोर कर देगा। अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक विशेषज्ञों की राय है कि यदि अमेरिका NATO से अलग होता है, तो रूस और चीन जैसे देशों के सामने यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी। इससे वैश्विक शक्ति संतुलन पर गंभीर असर पड़ सकता है। कुछ सांसदों ने चेतावनी भी दी है कि यह फैसला न केवल यूरोप बल्कि अमेरिका की अपनी सुरक्षा के लिए भी जोखिम पैदा करेगा, क्योंकि न्यूक्लियर डिटरेंस और सामूहिक सुरक्षा जैसे ढांचे अमेरिका की रक्षा रणनीति के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इसके बावजूद, बिल पेश करने वाले सांसद का कहना है कि अमेरिका अब “दुनिया का पुलिसवाला” बनने का खर्च नहीं उठा सकता। उनका तर्क है कि अमेरिकी करदाता पर बोझ बढ़ता जा रहा है, जबकि कई यूरोपीय देश अपनी GDP का पर्याप्त हिस्सा रक्षा बजट में नहीं लगाते। उन्होंने आरोप लगाया कि NATO एक “वन-वे स्ट्रीट” बन गया है—जहाँ संसाधन केवल अमेरिका से निकलते हैं, लेकिन उसके बदले अपेक्षित सहयोग नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि यह बिल उस बहस की शुरुआत है जो अमेरिका को बहुत पहले करनी चाहिए थी—क्या NATO अमेरिका के हित में है या नहीं?
अब यह बिल औपचारिक प्रक्रिया से गुजरेगा, जिसमें समिति समीक्षा, बहस और मतदान शामिल होगा। फिलहाल इसके पास होने की संभावना कम मानी जा रही है, क्योंकि अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान और दोनों पार्टियों का बड़ा हिस्सा NATO को अमेरिकी विदेशी नीति की रीढ़ मानता है। इसके बावजूद, इस बिल ने एक गंभीर और लंबी बहस का दरवाजा खोल दिया है—क्या अमेरिका को महंगे अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों से दूरी बनाकर ‘अमेरिका फर्स्ट’ सुरक्षा मॉडल की ओर बढ़ना चाहिए?
आने वाले दिनों में यह मुद्दा अमेरिकी राजनीति, यूरोपीय सुरक्षा और वैश्विक रणनीति के केंद्र में छाया रहेगा। यदि अमेरिका कभी NATO से बाहर होने की राह पर बढ़ता है, तो यह 21वीं सदी के भू-राजनीतिक परिदृश्य में सबसे बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।




