गुवाहाटी, 30 अक्टूबर 2025
असम में कांग्रेस पार्टी के एक कार्यक्रम से निकले एक वीडियो ने अचानक पूरे प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। खबर यह है कि कांग्रेस के श्रीभूमि जिला समिति के एक स्थानीय नेता विद्युभूषण ने 27 अक्टूबर को इंदिरा भवन में आयोजित एक पार्टी बैठक में “अमर सोनार बांग्ला” गीत गाया। वीडियो वायरल होते ही बीजेपी समेत कई दक्षिणपंथी संगठनों ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसके नेता अब बांग्लादेश का राष्ट्रगान गा रहे हैं। बीजेपी नेताओं ने इसे “राष्ट्रविरोधी मानसिकता” का उदाहरण बताते हुए कांग्रेस पर “विदेशी निष्ठा” का आरोप लगाया और कहा कि “कांग्रेस अब राष्ट्रीय सीमाओं की भी मर्यादा भूल चुकी है।” सोशल मीडिया पर “WE, THE PEOPLE OF BANGLADESH?!” जैसे व्यंग्यात्मक पोस्टों की बाढ़ आ गई और यह विवाद जल्द ही एक स्थानीय घटना से बढ़कर राष्ट्रीय बहस में बदल गया। इस बीच असम के मुख्यमंत्री ने ग्रेटर बांग्लादेश का एजेंडा फैलाने के आरोप में कार्रवाई के आदेश दिए हैं।
कांग्रेस पर हमला बोलते हुए असम बीजेपी के कई नेताओं ने कहा कि “यह कोई साधारण गलती नहीं है, बल्कि कांग्रेस की मानसिकता का प्रतिबिंब है, जो भारत की राष्ट्रवादी भावना से कट चुकी है।” भाजपा प्रवक्ताओं ने तंज कसा कि “यह वही कांग्रेस है जो एक समय ‘भारत जोड़ो’ की बात करती है और अब ‘बांग्लादेश जोड़ो’ का गीत गाती है।” बीजेपी के समर्थक सोशल मीडिया पर इसे कांग्रेस की “विचारधारात्मक दिशा भटकाव” का प्रतीक बता रहे हैं।
कांग्रेस का जवाब: “गीत नहीं, गौरव गाया गया है”
हालांकि, कांग्रेस ने इस पूरे विवाद पर एक बेहद सधा और ऐतिहासिक संदर्भों से भरा हुआ जवाब दिया है। पार्टी ने स्पष्ट किया कि “अमर सोनार बांग्ला” बांग्लादेश का राष्ट्रगान बनने से बहुत पहले भारत के महान कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा 1905 में रचा गया था। यह गीत “बंग-भंग” यानी बंगाल विभाजन के खिलाफ एक सांस्कृतिक प्रतिरोध का प्रतीक था। उस समय ब्रिटिश सरकार ने बंगाल को धार्मिक आधार पर बाँटने की कोशिश की थी, जिसका विरोध पूरे भारत में हुआ था। उसी आंदोलन के दौरान ठाकुर ने “अमर सोनार बांग्ला” लिखा था — जो भारत की अखंडता और सांस्कृतिक एकता का गीत था।
कांग्रेस प्रवक्ताओं ने कहा कि इस गीत को आज भी बंगाली लोग, चाहे वे भारत में हों या विदेश में, अपनी संस्कृति और अस्मिता का प्रतीक मानकर गाते हैं। पार्टी ने तीखे लहजे में कहा कि “जो लोग इस गीत को देशद्रोह से जोड़ रहे हैं, वे न केवल इतिहास से अनभिज्ञ हैं बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को भी अपमानित कर रहे हैं।” कांग्रेस ने यह भी जोड़ा कि “रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ही भारत का राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ भी लिखा था, इसलिए उनकी किसी भी रचना को विदेशी ठहराना भारतीयता का ही अपमान है।”
राजनीति और संस्कृति के बीच उलझा विवाद
यह विवाद अब केवल एक गीत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि असम की राजनीति के केंद्र में आ गया है। राज्य में बंगाली आबादी का एक बड़ा हिस्सा है, जिनकी पहचान में “अमर सोनार बांग्ला” जैसी रचनाएँ भावनात्मक महत्व रखती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बीजेपी इस विवाद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर भुनाने की कोशिश कर रही है, जबकि कांग्रेस इसे “संवेदनशील सांस्कृतिक अभिव्यक्ति” बताकर बचाव कर रही है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह विवाद उस सामाजिक विभाजन को और गहरा कर सकता है, जो असम में लंबे समय से भाषा और पहचान के सवाल पर मौजूद है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी सवाल खड़ा किया है कि क्या किसी ऐतिहासिक गीत को उसके मूल संदर्भ से काटकर वर्तमान राजनीति के तराजू पर तौला जाना चाहिए? क्या किसी रचना की सांस्कृतिक पहचान सिर्फ इसलिए बदल जाती है कि बाद में उसे किसी देश ने अपना लिया? इन सवालों ने इस विवाद को और गहरा कर दिया है।
इतिहास से सबक या राजनीति का हथियार?
सच यह है कि “अमर सोनार बांग्ला” तब लिखा गया जब भारत की स्वतंत्रता संग्राम अपने पहले बड़े सांस्कृतिक पड़ाव पर था। ठाकुर ने यह गीत उस समय लिखा जब बंगाल को धार्मिक आधार पर बाँटने की साजिश रची जा रही थी — ताकि हिंदू और मुसलमानों में विभाजन पैदा किया जा सके। उस वक्त यह गीत दोनों समुदायों के बीच एकता और भाईचारे का प्रतीक बन गया था। यही गीत बाद में 1971 में स्वतंत्र बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना, लेकिन इसका मूल भारतीय ही रहा।
आज जब कोई बंगाली इसे गाता है, तो वह केवल संगीत नहीं बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ाव का एहसास गाता है। इसे राष्ट्रविरोध कहना न केवल ऐतिहासिक रूप से गलत है, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अनुचित। कांग्रेस का कहना है कि “राजनीति करने वालों को रवीन्द्रनाथ ठाकुर की साहित्यिक गहराई समझने की जरूरत है, न कि उसे अपने चुनावी नारे में बदलने की।”
विवाद से परे सांस्कृतिक सच्चाई
असम में यह विवाद भले ही कुछ दिनों में ठंडा पड़ जाए, लेकिन इसने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि राजनीति कैसे संस्कृति पर हावी होती जा रही है। एक गीत, जो कभी एकता और स्वतंत्रता का प्रतीक था, आज राजनीतिक आरोपों का निशाना बन गया है। सच्चाई यह है कि “अमर सोनार बांग्ला” न तो विदेशी है और न ही किसी राष्ट्र के प्रति निष्ठा का प्रमाण। यह भारतीय उपमहाद्वीप की साझा आत्मा का गीत है — जिसे हर बंगाली, हर भारतीय गर्व से गा सकता है।




