फ्रांस में फिर बदल गया सत्ता का चेहरा
फ्रांस में एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता का दौर शुरू हो गया है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा हाल ही में नियुक्त प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकॉर्नु (Sébastien Lecornu) ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है — वह भी सिर्फ़ 26 दिनों के कार्यकाल के बाद। लेकॉर्नु का इस्तीफ़ा फ्रांस की मौजूदा सियासी परिस्थितियों को और जटिल बना रहा है, क्योंकि यह लगातार तीसरी बार है जब राष्ट्रपति मैक्रों को प्रधानमंत्री बदलना पड़ा है।
नियुक्ति से इस्तीफ़े तक — मुश्किलों से भरा एक महीना
सेबेस्टियन लेकॉर्नु को सितंबर 2025 में प्रधानमंत्री बनाया गया था। वह मैक्रों सरकार में पहले रक्षा मंत्री रह चुके थे और उन्हें “संतुलनकारी चेहरा” माना जा रहा था। लेकिन सत्ता संभालते ही उन्हें संसद में विपक्ष की कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। उनकी सरकार को बहुमत का समर्थन नहीं मिला, जिससे हर विधेयक पारित कराना कठिन हो गया। लेकॉर्नु ने संसद में सहयोग की अपील की, पर विपक्षी पार्टियों — खासकर नेशनल रैली (Marine Le Pen की पार्टी) और लेफ्ट ब्लॉक — ने सरकार को पूरी तरह अस्थिर कर दिया। इस असहयोग के माहौल में उन्होंने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया और कहा कि “फ्रांस को स्थिर सरकार की ज़रूरत है, जो इस वक़्त संभव नहीं।”
49.3 धारा’ का उपयोग न करने का फैसला पड़ा भारी
लेकॉर्नु ने अपने छोटे कार्यकाल में एक अहम निर्णय लिया — उन्होंने संविधान की धारा 49.3 का इस्तेमाल नहीं किया। यह धारा प्रधानमंत्री को संसद की अनुमति के बिना भी किसी विधेयक को पारित करने की शक्ति देती है।
हालांकि, उनके इस “लोकतांत्रिक रुख” को विपक्ष ने कमजोरी बताया। आलोचकों का कहना था कि वह “निर्णय लेने में हिचकिचाने वाले” प्रधानमंत्री थे, जबकि समर्थकों का कहना है कि उन्होंने लोकतंत्र की मर्यादा को बनाए रखा।
लेकिन सच्चाई यह है कि बिना बहुमत के सरकार चलाना असंभव था, और यही अंततः उनके इस्तीफ़े का कारण बना।
राष्ट्रपति मैक्रों पर दबाव, विपक्ष ने मांगा ताज़ा चुनाव
लेकॉर्नु के इस्तीफ़े के बाद अब पूरा ध्यान राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पर केंद्रित है। विपक्षी पार्टियों ने मांग की है कि संसद भंग कर ताज़ा आम चुनाव कराए जाएं। नेशनल रैली की नेता मरीन ले पेन ने कहा — “यह सरकार जनता की नहीं, राष्ट्रपति की इच्छा से बनी थी। अब जनता को बोलने का मौक़ा दिया जाना चाहिए।” लेफ्ट ब्लॉक ने कहा कि फ्रांस “एक संवैधानिक संकट” की ओर बढ़ रहा है और मैक्रों को अब जनादेश का सम्मान करना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय और आर्थिक असर
फ्रांस की इस राजनीतिक उथल-पुथल का असर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महसूस किया जा रहा है। यूरोपीय बाज़ारों में अनिश्चितता बढ़ गई है, और निवेशकों का भरोसा डगमगा रहा है। यूरो करेंसी में हल्की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि फ़्रांसीसी शेयर बाज़ार (CAC 40) में शुरुआती घंटे में 1.2% की गिरावट आई।K यह संकट सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता के लिए भी चुनौती है — क्योंकि यूरोप में फ्रांस को “स्थिर नेतृत्व” का प्रतीक माना जाता है।
फिट बदलेगी सरकार, या होंगे नए चुनाव?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि राष्ट्रपति मैक्रों अगला कदम क्या उठाएँगे। दो संभावनाएँ हैं — या तो वे एक नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति करें, या फिर संसद को भंग कर नए चुनाव की घोषणा करें। राष्ट्रपति कार्यालय ने फिलहाल कहा है कि “स्थिति पर विचार जारी है” और अगले कुछ दिनों में घोषणा की जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मैक्रों फिर से किसी अंदरूनी सहयोगी को प्रधानमंत्री बनाते हैं, तो यह केवल “अस्थायी समाधान” होगा — क्योंकि जड़ की समस्या संसद में बहुमत का न होना है।
फ्रांस में “स्थिरता” अब सबसे बड़ा मुद्दा
सेबेस्टियन लेकॉर्नु का इस्तीफ़ा फ्रांस की राजनीति में एक बड़ा झटका है। यह स्पष्ट करता है कि राष्ट्रपति मैक्रों की नीतियों और नेतृत्व पर गहरा अविश्वास कायम है।
लगातार सरकारों के बदलने से फ्रांस की जनता में भी नाराज़गी है — लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर सत्ता की लड़ाई कब ख़त्म होगी और “स्थिर शासन” कब मिलेगा।
यूरोप की राजनीति में जहां दाएँ और बाएँ विचारधाराओं का टकराव लगातार तेज़ हो रहा है, वहीं फ्रांस का यह संकट एक गंभीर संकेत है — कि लोकतंत्र में केवल चुनाव जीतना पर्याप्त नहीं, बल्कि विश्वास और स्थायित्व बनाए रखना ही असली चुनौती है।




