एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | फरवरी 2026
एक ई-मेल, जिसने सत्ता को कटघरे में खड़ा किया
कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने जेफ्री एप्सटीन से जुड़े कुछ ई-मेल्स के आधार पर केंद्र की मोदी सरकार के शुरुआती दौर को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। पवन खेड़ा का कहना है कि ये ई-मेल्स महज़ निजी बातचीत नहीं थे, बल्कि इनमें सत्ता, पैसे और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के संभावित रिश्तों की झलक मिलती है। उनके मुताबिक, अगर इन दस्तावेज़ों को ईमानदारी से देखा जाए, तो 2014 में बनी नई सरकार के पहले ही दिनों पर कई असहज सवाल खड़े हो जाते हैं।
5 जून 2014 का ई-मेल: शपथ के दस दिन बाद
पवन खेड़ा के अनुसार, 5 जून 2014 को—यानी नरेंद्र मोदी के पहली बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के ठीक दस दिन बाद—कुख्यात फाइनेंसर जेफ्री एप्सटीन ने अमेरिकी अरबपति टॉम प्रित्ज़कर को एक ई-मेल लिखा।
इस ई-मेल में एप्सटीन ने पूछा, “क्या हमें जेटली और मोदी के साथ मिलकर भारत का दौरा करना चाहिए?” खेड़ा बताते हैं कि कुछ ही घंटों में प्रित्ज़कर का जवाब आया—“आपको भारत से नफरत हो जाएगी… चलिए किसी समय को देखते हैं, लेकिन गर्मियों में नहीं।”
क्यों चिंता पैदा करते हैं ये ई-मेल्स
पवन खेड़ा का कहना है कि उस समय एप्सटीन पहले से ही यौन अपराध के दोषी ठहराए जा चुके थे। ऐसे व्यक्ति द्वारा भारत के प्रधानमंत्री और तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली के नाम लेकर बातचीत करना स्वाभाविक रूप से गंभीर चिंता पैदा करता है। उनके मुताबिक, यह संकेत देता है कि भाजपा के सत्ता में आने के कुछ ही दिनों बाद भारत का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व एप्सटीन के अंतरराष्ट्रीय संपर्कों की चर्चा में आ गया था।
क्या यह एक अकेली बातचीत थी?
खेड़ा का दावा है कि यह मामला केवल एक ई-मेल तक सीमित नहीं दिखता। उनके अनुसार, बाद की कथित बातचीतों में एप्सटीन के संपर्क हरदीप सिंह पुरी, अनिल अंबानी और बिल गेट्स जैसे नामों से भी जुड़े हुए बताए जाते हैं। पवन खेड़ा का कहना है कि इससे यह आभास मिलता है कि भाजपा के शासनकाल में भारत, एप्सटीन के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के दायरे में आता चला गया। हालांकि, इन दावों की कोई स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अब तक सामने नहीं आई है।
पवन खेड़ा के पाँच सीधे सवाल
इन ई-मेल्स के आधार पर पवन खेड़ा ने सत्ताधारी पक्ष से पाँच सीधे सवाल पूछे हैं। पहला, क्या कभी मोदी, अरुण जेटली और एप्सटीन के बीच कोई बैठक हुई? दूसरा, क्या किसी स्तर पर संपर्क बनाने की कोशिश की गई और इसकी पहल किसने की? तीसरा, यदि संपर्क था तो उसका स्वरूप क्या था—राजनीतिक, आर्थिक, कूटनीतिक या निजी? चौथा, 2014 में नई बनी सरकार में ऐसी क्या बात थी जिसने एप्सटीन की भारत में अचानक रुचि जगा दी? और पाँचवाँ, भाजपा या सत्ता से जुड़े लोगों और एप्सटीन के नेटवर्क के बीच संपर्क की सीमा आखिर कितनी थी?
सरकार की चुप्पी और जांच की ज़रूरत
इन सवालों पर अब तक सरकार या जिन लोगों के नाम सामने आए हैं, उनकी ओर से कोई साफ़ और विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ऐसे मामलों में आरोपों और भावनाओं से ऊपर उठकर दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता, समय-रेखा और संदर्भ की निष्पक्ष जांच बेहद ज़रूरी है। बिना पूरी जांच के किसी निष्कर्ष पर पहुँचना लोकतांत्रिक बहस के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
निष्कर्ष: सवाल कायम हैं, जवाब का इंतज़ार
पवन खेड़ा के दावे अगर आगे चलकर प्रमाणित होते हैं, तो यह 2014 के शुरुआती दिनों में सत्ता, पूंजी और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के रिश्तों पर बड़े सवाल खड़े कर सकते हैं। फिलहाल यह मामला सवालों और दावों के स्तर पर है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए ज़रूरी है कि इन ई-मेल्स और कथित संपर्कों पर स्वतंत्र तथ्य-जांच हो और देश के सामने साफ़, भरोसेमंद जवाब रखे जाएँ।





