नई दिल्ली 13 नवंबर 2025
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बहुचर्चित “महायोजनाओं” की सच्चाई आखिरकार संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट में उजागर हो गई है। रिपोर्ट ने यह साफ़ कहा है कि केंद्र सरकार की प्रमुख छह फ्लैगशिप योजनाओं का क्रियान्वयन बुरी तरह असफल रहा है। और खास बात यह है कि इस समिति में अधिकांश सांसद खुद बीजेपी और उसके सहयोगी दलों से हैं — यानी आरोप विपक्ष का नहीं, बल्कि सरकार के अपने घर से उठा है।
रिपोर्ट के अनुसार, मोदी सरकार की जिन छह बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए ₹36,500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, उनमें से अब तक केवल 21% धनराशि ही खर्च की जा सकी है। बाकी पैसा या तो जारी नहीं हुआ, या योजनाएं कागज़ों में ही फंसी रह गईं। यह न सिर्फ वित्तीय अक्षमता को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि प्रधानमंत्री की बड़ी-बड़ी घोषणाओं और ज़मीनी हकीकत के बीच कितना गहरा अंतर है।
सबसे पहले, ‘स्वच्छ भारत अभियान’ — जिसे मोदी सरकार ने जनांदोलन के रूप में प्रचारित किया था, उसकी स्थिति बेहद निराशाजनक है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस योजना के लिए ₹5,800 करोड़ जारी किए गए, लेकिन अब तक मात्र ₹2,200 करोड़ खर्च हो पाए। ग्रामीण इलाकों में खुले में शौच की समस्या खत्म होने के सरकारी दावे झूठे साबित हुए हैं। कई राज्यों ने बताया कि शौचालय तो बने, पर पानी, रखरखाव और उपयोगिता की व्यवस्था नहीं हो सकी।
दूसरा बड़ा झटका ‘स्मार्ट सिटीज़ प्रोजेक्ट’ को लगा है — मोदी की सबसे प्रचारित शहरी योजना। इस योजना के तहत देशभर के 100 शहरों को स्मार्ट बनाने का सपना दिखाया गया था। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, ₹9,700 करोड़ की राशि में से मात्र ₹1,182 करोड़ खर्च किए गए। नतीजा यह हुआ कि दर्जनों “स्मार्ट सिटीज़ मिशन” या तो अधूरे पड़े हैं या बंद हो चुके हैं। कई शहरों में जो काम शुरू हुआ, वह तकनीकी खामियों, भ्रष्टाचार और समन्वय की कमी के कारण ठप हो गया। यह साफ़ दिखाता है कि “स्मार्ट इंडिया” की कहानी केवल पोस्टर और विज्ञापन तक सीमित रह गई है।
तीसरी योजना, ‘अटल मिशन फॉर रीजुवनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (AMRUT)’, भी अपनी रफ्तार खो चुकी है। इस योजना का मकसद शहरों में जलापूर्ति और सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाना था। लेकिन ₹3,840 करोड़ में से केवल ₹2,400 करोड़ ही खर्च हो सके। रिपोर्ट ने स्पष्ट रूप से लिखा कि राज्य सरकारों और केंद्र के बीच तालमेल की भारी कमी रही, जिसकी वजह से फंड्स रिलीज़ ही नहीं हो पाए या समय पर उपयोग नहीं हुए।
इसके अलावा ‘प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY)’ का हाल भी कुछ बेहतर नहीं है। गरीबों को घर देने के दावे के बावजूद, ₹9,700 करोड़ के आवंटन में से सिर्फ ₹2,000 करोड़ ही खर्च किए जा सके। ज़मीनी स्तर पर कई राज्यों ने शिकायत की कि फंड्स समय पर नहीं मिले और जो मकान बने, वे अधूरे रह गए। मोदी सरकार के “हर गरीब को घर” का वादा अब महज़ चुनावी नारा साबित हो रहा है।
‘दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन’ और ‘हेरिटेज सिटी डेवलपमेंट एंड ऑग्मेंटेशन योजना’ भी रिपोर्ट में फेल साबित हुई हैं। दोनों योजनाओं के लिए क्रमशः ₹1,150 करोड़ और ₹248 करोड़ जारी किए गए थे, लेकिन खर्च क्रमशः ₹848 करोड़ और ₹32.6 करोड़ तक सीमित रहे। यानी विकास के नाम पर केवल फाइलें चलीं, ज़मीन पर कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ।
रिपोर्ट का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सहयोग की भारी कमी है। राज्य बार-बार शिकायत करते रहे कि केंद्र समय पर पैसा नहीं भेजता, जबकि केंद्र का कहना है कि राज्य प्रोजेक्ट रिपोर्ट समय पर नहीं देते। इस “पिंग-पोंग राजनीति” में जनता के विकास की योजनाएं कहीं खो गई हैं।
भारतीय लोक प्रशासन संस्थान के प्रोफेसर जयजीत भट्टाचार्य ने रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए कहा, “भारत जैसे विशाल देश में विकास तभी संभव है जब केंद्र और राज्य दोनों एक ही दिशा में काम करें। लेकिन दुर्भाग्य से, इस सरकार में योजनाएं घोषणाओं में फँस गईं और ज़मीनी क्रियान्वयन की प्रक्रिया अव्यवस्थित रह गई।”
सरकार ने इस रिपोर्ट को खारिज करने की कोशिश की है। सरकारी प्रवक्ता का कहना है कि समिति की गणनाएँ गलत हैं और “वास्तविक” आंकड़े इससे बेहतर हैं। लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ ठीक है, तो फिर क्यों हर योजना की प्रगति रिपोर्ट खुद मंत्रालय की वेबसाइटों पर ठहरी हुई है? क्यों करोड़ों रुपये की धनराशि निष्क्रिय पड़ी है जबकि जनता अभी भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है?
यह रिपोर्ट एक कठोर सच्चाई सामने लाती है — मोदी सरकार की ‘ग्रैंड स्कीमें’ वास्तव में ‘ग्रैंड फेल्योर’ बन चुकी हैं। “हर शहर स्मार्ट”, “हर गरीब को घर”, “हर गली साफ़” जैसे नारों के पीछे अब सड़कों पर अधूरे प्रोजेक्ट्स, जंग लगे बोर्ड, और ठेकेदारों के विवाद दिख रहे हैं।
प्रधानमंत्री की योजनाओं का प्रचार जितना विशाल था, उनकी सफलता उतनी ही छोटी साबित हुई। और सबसे बड़ा सबक यह है कि विकास घोषणाओं से नहीं, पारदर्शिता और जवाबदेही से होता है। आज ज़रूरत है कि सरकार अपनी योजनाओं के प्रचार पर नहीं, उनके वास्तविक परिणामों पर ध्यान दे — क्योंकि भारत को पोस्टर नहीं, प्रगति चाहिए।




