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संसद बहिष्कार: विरोध नहीं, चेतावनी का लोकतांत्रिक औज़ार

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एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 7 फरवरी 2026

लोकतंत्र की आख़िरी दस्तक: बहिष्कार क्यों ज़रूरी हो जाता है

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे—जिन्हें स्नेह से बाबा खड़गे कहा जाता है—जिस संसद सत्र के पूर्ण बहिष्कार की बात कर रहे हैं, वह महज़ राजनीतिक नाराज़गी नहीं, बल्कि लोकतंत्र को दी जा रही एक गंभीर चेतावनी है। जब संसद के भीतर विपक्ष की आवाज़ को व्यवस्थित रूप से दबाया जाए, सवाल पूछने पर रोक लगे, भाषण रिकॉर्ड से हटाए जाएँ और निलंबन को हथियार बना लिया जाए, तब संसद केवल संख्या का मंच बनकर रह जाती है। ऐसे हालात में बहिष्कार लोकतंत्र से पलायन नहीं, बल्कि उसे बचाने का आख़िरी संवैधानिक औज़ार बनता है—ताकि देश ही नहीं, दुनिया भी देखे कि सब कुछ सामान्य नहीं है।

मोदी सरकार पर घिरे सवाल, लेकिन बहस से परहेज़

आज केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार एक साथ कई मोर्चों पर घिरी हुई है। चाहे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित एप्सटीन फाइल्स का मुद्दा हो, अमेरिका के दबाव में बताई जा रही ट्रेड डील हो, या फिर जनरल मनोज नरवणे की किताब में लद्दाख और चीन से जुड़े खुलासों का मामला—हर विषय सीधे राष्ट्रीय हित और सुरक्षा से जुड़ा है। इन पर संसद में खुली चर्चा होनी चाहिए थी, लेकिन सरकार बहस से बचती नज़र आ रही है। विपक्ष का आरोप है कि असहज सवालों से बचने के लिए संसद की आवाज़ ही बंद कर दी गई है।

राहुल गांधी को बोलने से रोका जाना: संकेत क्या हैं?

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और किसानों से जुड़े मुद्दे संसद में उठाना चाहते हैं, लेकिन बार-बार उन्हें बोलने से रोका जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि यह कोई प्रक्रिया संबंधी मामला नहीं, बल्कि असहमति को कुचलने की नीति है। जब नेता प्रतिपक्ष को ही सदन में अपनी बात रखने का अवसर न मिले, तो यह संसद की आत्मा पर सीधा प्रहार माना जाएगा।

अंतरराष्ट्रीय सबक: जॉर्जिया से बांग्लादेश तक

यूरोप के देश जॉर्जिया में 2024 के विवादित चुनावों के बाद विपक्ष ने संसद का पूर्ण बहिष्कार किया। सत्ताधारी जॉर्जियन ड्रीम पर तानाशाही और चुनावी धांधली के आरोप लगे और संसद के बाहर लोकतंत्र की लड़ाई सड़कों पर उतर आई। इसी तरह दक्षिण एशिया में बांग्लादेश में 2024 के चुनावों और संसद के बहिष्कार को नज़रअंदाज़ करने की कीमत सत्ता को भारी पड़ी—हालात यहाँ तक पहुँचे कि लंबे समय तक शासन करने वाली शेख़ हसीना को देश छोड़ना पड़ा। ये उदाहरण बताते हैं कि लोकतांत्रिक चेतावनियों को अनसुना करना कितना महँगा पड़ सकता है।

भारत के लिए सवाल: क्या दुनिया को सच दिखाने का वक्त है?

भारत में आज सवाल सीधा है—क्या संसद के भीतर लोकतंत्र की जगह बची है? जब बहस की जगह बहुमत का दंभ ले ले, और सत्ता असुविधाजनक सवालों से भागे, तब संसद बहिष्कार एक प्रतीकात्मक लेकिन शक्तिशाली संदेश बन जाता है। यह संदेश सरकार को ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी जाता है कि देश के लोकतांत्रिक संस्थानों पर दबाव बढ़ रहा है।

बहिष्कार लक्ष्य नहीं, लोकतंत्र की रक्षा का संकेत

संसद का बहिष्कार सत्ता गिराने की साज़िश नहीं, बल्कि लोकतंत्र को बचाने की पुकार है। बाबा खड़गे की अपील इसी चेतावनी का रूप है। असली सवाल यह है कि क्या सरकार इस चेतावनी को सुनेगी, या फिर इतिहास के उन अध्यायों में अपना नाम दर्ज कराएगी जहाँ सत्ता ने संवाद छोड़कर दमन का रास्ता चुना। आज बहिष्कार कोई अंत नहीं—यह लोकतंत्र को बचाने की आख़िरी घंटी है।

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