धर्म/आस्था | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 अप्रैल 2026
परशुराम जयंती के अवसर पर हर वर्ष भगवान परशुराम से जुड़ी अनेक कथाएं श्रद्धा और जिज्ञासा के साथ याद की जाती हैं, लेकिन इनमें से एक कथा ऐसी है जो जितनी विचित्र है उतनी ही गहन आध्यात्मिक अर्थों से भरी हुई भी मानी जाती है। यह कथा उनके पिता जमदग्नि के आदेश, माता रेणुका के वध और फिर उसी परिवार के पुनर्जीवन से जुड़ी है। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित इस प्रसंग को आज भी धर्म, तपस्या और आज्ञाकारिता के चरम उदाहरण के रूप में देखा जाता है, हालांकि आधुनिक संदर्भ में इसे प्रतीकात्मक दृष्टि से समझना अधिक उचित माना जाता है।
कथा के अनुसार, एक दिन माता रेणुका नदी पर जल भरने गई थीं। वहां उन्होंने एक गंधर्व को देखा और कुछ क्षणों के लिए उनका मन विचलित हो गया। ऋषि जमदग्नि अत्यंत तपस्वी और योगबल से संपन्न थे, जिन्होंने अपने ध्यान के माध्यम से इस मानसिक विचलन को जान लिया। उन्होंने इसे पतिव्रत धर्म से विचलन के रूप में देखा और क्रोध में आकर अपने पुत्रों की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने अपने चारों बड़े पुत्रों को आदेश दिया कि वे अपनी माता का वध करें, लेकिन सभी ने इस कठोर आदेश को मानने से इंकार कर दिया। इससे क्रोधित होकर ऋषि जमदग्नि ने उन्हें श्राप दे दिया, जिससे वे अपनी चेतना और शक्ति खो बैठे। यह प्रसंग उस समय के कठोर तप और अनुशासन की झलक देता है, जहां गुरु या पिता की आज्ञा सर्वोपरि मानी जाती थी।
जब अंत में बारी भगवान परशुराम की आई, तो उन्होंने बिना किसी तर्क या प्रश्न के अपने पिता की आज्ञा का पालन किया और माता रेणुका का वध कर दिया। यह घटना सुनने में जितनी कठोर और अस्वीकार्य प्रतीत होती है, उतनी ही गहराई से यह उस युग के धर्म, कर्तव्य और आज्ञाकारिता की पराकाष्ठा को दर्शाती है। परशुराम का यह निर्णय उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को उजागर करता है जिसमें व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर कर्तव्य को सर्वोच्च स्थान दिया गया। यही कारण है कि उन्हें न केवल एक योद्धा, बल्कि एक तपस्वी और धर्मनिष्ठ अवतार के रूप में भी देखा जाता है।
इस घटना के बाद जब ऋषि जमदग्नि ने परशुराम की आज्ञाकारिता और निष्ठा को देखा तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने उन्हें वरदान मांगने को कहा। तब भगवान परशुराम ने जो वरदान मांगे, वही इस कथा को एक नए मोड़ पर ले जाते हैं। उन्होंने अपनी माता रेणुका को पुनः जीवित करने का वरदान मांगा, साथ ही अपने सभी भाइयों को उनके पूर्व स्वरूप में वापस लाने की प्रार्थना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने यह भी चाहा कि उन्हें चिरंजीवी होने का वरदान प्राप्त हो। ऋषि जमदग्नि ने प्रसन्न होकर ये सभी वरदान प्रदान कर दिए, जिसके परिणामस्वरूप माता और भाई पुनर्जीवित हो गए और परशुराम को अमरत्व का आशीर्वाद मिला। इस प्रकार यह कथा केवल वध तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पुनर्जीवन और करुणा के संदेश के साथ पूर्ण होती है।
यह पूरा प्रसंग भारतीय धार्मिक परंपरा में कई स्तरों पर व्याख्यायित किया जाता है। एक ओर यह अटूट आज्ञाकारिता और गुरु-भक्ति का प्रतीक है, तो दूसरी ओर यह तप और शक्ति के संतुलन का भी संदेश देता है। आधुनिक समय में इस कथा को शाब्दिक रूप से नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक रूप में समझा जाता है—जहां ‘वध’ को अहंकार, मोह और दुर्बलताओं के नाश के रूप में देखा जाता है, और ‘पुनर्जीवन’ को आत्मशुद्धि और नई शुरुआत के रूप में।
परशुराम जयंती, जो अक्षय तृतीया के दिन मनाई जाती है, केवल एक जन्मोत्सव नहीं बल्कि धर्म, साहस, अनुशासन और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है। भगवान परशुराम की यह कथा हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कर्तव्य, त्याग और संतुलन के बीच सही मार्ग कैसे चुना जाए, और यह भी कि शक्ति का उपयोग केवल धर्म की स्थापना के लिए ही होना चाहिए।




