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पाकिस्तान का गाजा जुआ: असिम मुनीर की ‘जिहादी’ छवि को तोड़ने की मजबूर कोशिश

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अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो 29 अक्टूबर 2025

भूमिका: मुस्लिम नेतृत्व के नाम पर एक जोखिम भरा कदम

गाजा में जारी संघर्ष के बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर खुद को मुस्लिम देशों के ‘रक्षक’ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है। जनरल असिम मुनीर — जिन पर लंबे समय से ‘जिहादी जनरल’ का टैग लगा है — ने फिलिस्तीन के समर्थन को पाकिस्तान की कूटनीति का केंद्र बनाने की कोशिश की है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह मुनीर का रणनीतिक दांव है या राजनीतिक जुआ?

गाजा और पाकिस्तान: समर्थन की आड़ में ‘जिहादी नेटवर्क’ का पुनर्जीवन

अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद पाकिस्तान ने सार्वजनिक रूप से फिलिस्तीन के साथ एकजुटता दिखाई।

परंतु अंतरराष्ट्रीय खुफिया रिपोर्टों — जिनमें रॉयटर्स, द हिंदू और बीबीसी की जांचें शामिल हैं — के अनुसार, पाकिस्तान की आईएसआई ने कथित रूप से हमास और हिजबुल्लाह से संपर्क साधने की कोशिश की।

हालांकि इसका कोई औपचारिक प्रमाण नहीं मिला, लेकिन यह चर्चा जरूर है कि पाकिस्तान ने कुछ ‘प्रॉक्सी नेटवर्क’ को गाजा मोर्चे पर सक्रिय करने की योजना बनाई थी।

यह कदम पाकिस्तान के आर्थिक संकट (2023–2025) के दौर में उठाया गया — जब देश IMF के $7 बिलियन बेलआउट पर निर्भर था। इस पृष्ठभूमि में यह “गाजा कार्ड” मुस्लिम दुनिया में नेतृत्व की कुर्सी पाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

असिम मुनीर का द्वंद्व: ‘एंटी-टेरर’ जनरल या ‘इस्लामी योद्धा’?

जनरल असिम मुनीर की छवि विरोधाभासों से भरी है।

एक ओर उन्होंने तालिबान और ISIS-K जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ अभियान चलाया, वहीं दूसरी ओर उनके आलोचक — विशेष रूप से इमरान खान समर्थक गुट — उन्हें ‘इस्लामी एजेंडा’ वाला जनरल बताते हैं।

मुनीर की बयानबाजी अक्सर धार्मिक राष्ट्रवाद की झलक देती है, जो पाकिस्तान के सैन्य-धार्मिक गठजोड़ का हिस्सा रही है।

गाजा में इस्लामी एकजुटता के नाम पर सक्रिय होना, असिम मुनीर को अंतरराष्ट्रीय मंच पर “डबल गेम” खेलने वाले नेता की छवि दे सकता है — जहाँ एक तरफ वे अमेरिका को “आतंक विरोधी साझेदार” बताते हैं, और दूसरी तरफ इस्लामी राष्ट्रों के सामने खुद को “मजहबी रक्षक” के रूप में पेश करते हैं।

आर्थिक संकट के बीच धार्मिक कूटनीति: क्या यह ‘मोरल एक्सरसाइज’ काम आएगी?

पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार सितंबर 2025 तक घटकर $9 बिलियन रह गया है। इस बीच, गाजा को $1 मिलियन की मदद और हमास के समर्थन में बयानबाजी ने IMF और पश्चिमी निवेशकों के बीच अविश्वास बढ़ाया है।

अमेरिका और यूरोप पहले ही पाकिस्तान को FATF ग्रे लिस्ट से हटाने में हिचक दिखा रहे हैं। ऐसे में ‘मुस्लिम एकजुटता’ की यह नीति, आर्थिक सुधारों की दिशा में रोड़ा बन सकती है।

भारत और अंतरराष्ट्रीय समीकरण: बढ़ता अविश्वास और सीमित सहानुभूति

भारत के लिए यह घटनाक्रम चिंता का विषय है। दिल्ली ने स्पष्ट कर दिया है कि हमास एक आतंकी संगठन है और किसी भी अप्रत्यक्ष समर्थन को “वैश्विक आतंकवाद के समर्थन” के रूप में देखा जाएगा। अमेरिका भी अब पाकिस्तान को गाजा के मुद्दे पर ‘पॉलिटिकल थियेटर’ खेलते हुए देख रहा है। पाकिस्तान के इस व्यवहार से दक्षिण एशिया में उसका सामरिक संतुलन बिगड़ सकता है, खासकर ऐसे समय में जब ईरान और चीन के साथ उसके रिश्ते पहले से गहरे हो चुके हैं।

 असिम मुनीर का गाजा दांव – न तो धार्मिक सफलता, न कूटनीतिक लाभ

जनरल असिम मुनीर शायद यह साबित करना चाहते हैं कि वे “पाकिस्तान के पहले ग्लोबल इस्लामी लीडर” के रूप में देखे जाएं, लेकिन गाजा में जिहादी संगठनों से जुड़ाव का आभास उनकी विश्वसनीयता को और कमजोर कर रहा है।

यह दांव पाकिस्तान की सैन्य प्रतिष्ठा और कूटनीतिक स्थिति — दोनों पर उल्टा असर डाल सकता है।

आख़िरकार, दुनिया अब पाकिस्तान के हर कदम को धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और सुरक्षा नीति के नजरिए से देख रही है।

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